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सुमेर सिंह भाटी को Rangeland Restoration Award 2026 | Rajasthan

सुमेर सिंह भाटी का ओरण मिशन: कैसे मरुस्थल में लौटी हरियाली और जलधारा? जानिए पूरी कहानी

सुमेर सिंह भाटी को Rangeland Restoration Award 2026 | Rajasthan

संक्षिप्त जानकारी ✅

🟢 'रेंजलैंड रेस्टोरेशन अवार्ड 2026' - सुमेर सिंह भाटी, राजस्थान

🟢 राजस्थान के ऊंट पालक सुमेर सिंह भाटी को 18 अगस्त, 2026 को मंगोलिया में 'यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन टू कॉम्बैट डेज़र्टिफिकेशन' (UNCCD) के COP17 में 'रेंजलैंड रेस्टोरेशन अवार्ड 2026' से सम्मानित किया गया।

🟢 राजस्थान के जैसलमेर के रहने वाले, पारंपरिक ऊँट पालक और 'ओरण बचाओ' आंदोलन के सह-संस्थापक सुमेर सिंह भाटी को थार रेगिस्तान के लगभग 10,000 हेक्टेयर पवित्र घास के मैदानों (ओरण) की सुरक्षा के लिए ज़मीनी स्तर पर किए गए उनके काम के लिए यह सम्मान मिला।

🟢 उन्होंने 20 गांवों को एकजुट किया और 'देगराई माता ओरण' को कमर्शियल ज़मीन के इस्तेमाल और सोलर/विंड प्रोजेक्ट्स जैसे खतरों से बचाने के लिए बड़े पैमाने पर सामुदायिक मार्च 'सेव ओरन पदयात्रा' का जैसलमेर से जयपुर तक नेतृत्व किया।

🟢 उनके बहाली के प्रयासों से स्थानीय चरागाहों और पारंपरिक जल स्रोतों (बेरियों) को फिर से जीवित करने में मदद मिली, जिससे 50,000 से ज़्यादा पशुओं और स्थानीय चरवाहा समुदायों को सहारा मिला।

🟢 सुमेर सिंह भाटी ऊंट चराने वाले एक पारंपरिक चरवाहे हैं, जिन्होंने राजस्थान के 'ओरन' (पवित्र घास के मैदान) को बचाने में कई साल बिताए हैं। ये पवित्र घास के मैदान पशुधन, वन्यजीवों और स्थानीय समुदायों के लिए बहुत ज़रूरी हैं।

🟢 'रेंजलैंड रेस्टोरेशन अवार्ड्स'

🟢 'रेंजलैंड रेस्टोरेशन अवार्ड्स' (आधिकारिक तौर पर 'रेंजलैंड रेस्टोरेशन अवार्ड्स एंड चैंपियंस') की शुरुआत 2026 में 'रेंजलैंड्स और पशुपालकों के अंतर्राष्ट्रीय वर्ष' (IYRP 2026) के तहत की गई थी।

🟢 संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2026 को 'रेंजलैंड्स और पशुपालकों का अंतर्राष्ट्रीय वर्ष' (IYRP) घोषित किया।

🟢 सुमेर सिंह भाटी का योगदान

🟢 सुमेर सिंह भाटी ने न केवल एशियाई बस्टर्ड (गोडावण पक्षी) को ऊपर से गुज़रने वाली बिजली की लाइनों से बचाने में मदद की, बल्कि जैसलमेर इलाके में दुर्लभ एशियाई काराकल (एक प्रकार की जंगली बिल्ली) के दस्तावेज़ीकरण में भी योगदान दिया।

🟢 उनकी कोशिशें इस वैज्ञानिक तथ्य को साबित करती हैं कि घास के मैदान कार्बन को जमा करने और पानी को बचाने में मदद करते हैं। थार के घास के मैदानों की बहाली ने यह दिखाया है कि जंगलों के अलावा अन्य इकोसिस्टम की सुरक्षा भी कितनी ज़रूरी है।


पूरी जानकारी Details में निचे देखें :-

रेंजलैंड रेस्टोरेशन अवार्ड 2026: राजस्थान के ऊंट पालक सुमेर सिंह भाटी को मिला अंतरराष्ट्रीय सम्मान, जानिए ओरण बचाने की पूरी कहानी

राजस्थान के जैसलमेर की पहचान सिर्फ थार के रेगिस्तान, सुनहरी रेत और ऐतिहासिक किलों से नहीं है। इस क्षेत्र की एक और बेहद महत्वपूर्ण पहचान यहां के ओरण, यानी पारंपरिक रूप से समुदायों द्वारा संरक्षित पवित्र घास के मैदान और प्राकृतिक क्षेत्र हैं। सदियों से ये क्षेत्र स्थानीय पशुपालकों, पशुधन, वन्यजीवों और रेगिस्तानी पारिस्थितिकी तंत्र के लिए जीवनरेखा की तरह काम करते आए हैं।

इन्हीं ओरण क्षेत्रों की रक्षा और बहाली के लिए लंबे समय से जमीन पर काम कर रहे राजस्थान के जैसलमेर निवासी सुमेर सिंह भाटी को वर्ष 2026 में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिला है। 18 अगस्त 2026 को मंगोलिया के उलानबटार में आयोजित UNCCD COP17 से जुड़े कार्यक्रम में उन्हें Rangeland Restoration Award 2026 से सम्मानित किया गया। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आयोजित इस कार्यक्रम में जमीनी स्तर पर रेंजलैंड और पशुपालक समुदायों के लिए काम करने वाले लोगों को सम्मानित किया गया। ILRI ने भी 18 अगस्त को आयोजित Rangeland Restoration Champions कार्यक्रम में सुमेर सिंह भाटी के सम्मान की जानकारी साझा की है।

यह सम्मान इसलिए भी खास है क्योंकि सुमेर सिंह भाटी किसी बड़े संस्थान या कॉरपोरेट संगठन से जुड़े पर्यावरण विशेषज्ञ के रूप में नहीं, बल्कि परंपरागत ऊंट पालक और पशुपालक समुदाय से आने वाले व्यक्ति के रूप में ओरण संरक्षण की लड़ाई लड़ते रहे हैं। उनके काम ने यह संदेश दिया है कि प्रकृति संरक्षण केवल बड़े संगठनों या वैज्ञानिक संस्थानों का विषय नहीं है, बल्कि स्थानीय समुदाय भी अपने अनुभव और परंपरागत ज्ञान के आधार पर पर्यावरण की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

सुमेर सिंह भाटी कौन हैं?

सुमेर सिंह भाटी राजस्थान के जैसलमेर जिले के सांवता/सनवाटा गांव से जुड़े पारंपरिक पशुपालक हैं। IYRP के उपलब्ध प्रोफाइल के अनुसार उनका परिवार कई पीढ़ियों से पशुपालन से जुड़ा रहा है और वे स्वयं भी ऊंट तथा अन्य पशुधन पालते रहे हैं। उनके पशुधन में जैसलमेरी ऊंट के साथ-साथ गाय, भेड़ और अन्य पशु शामिल रहे हैं।

उनकी कहानी किसी सामान्य पर्यावरण अभियान की कहानी नहीं है। रेगिस्तान में रहने वाले पशुपालक के लिए चरागाह केवल जमीन का एक टुकड़ा नहीं होता। वही जमीन उसके पशुओं के भोजन, पानी और उसके परिवार की आजीविका से जुड़ी होती है।

जैसलमेर जैसे शुष्क क्षेत्र में घास के मैदानों और पारंपरिक जल स्रोतों का महत्व और भी बढ़ जाता है। यहां हरियाली सीमित है और वर्षा भी कम होती है। ऐसे में जहां प्राकृतिक घास, झाड़ियां, पेड़ और पानी के पारंपरिक स्रोत मौजूद होते हैं, वे स्थानीय जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बन जाते हैं।

सुमेर सिंह भाटी ने इसी स्थानीय अनुभव से समझा कि यदि ओरण सुरक्षित नहीं रहे तो इसका असर सिर्फ पेड़-पौधों पर नहीं पड़ेगा, बल्कि पशुपालकों, पशुधन और वन्यजीवों पर भी पड़ेगा।

क्या होता है ओरण?

राजस्थान के पश्चिमी हिस्से में ओरण उन पारंपरिक सामुदायिक क्षेत्रों को कहा जाता है जिन्हें स्थानीय समाज धार्मिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय महत्व के कारण लंबे समय से संरक्षित करता आया है।

ओरण में पेड़-पौधों को नुकसान पहुंचाना, अनावश्यक कटाई करना या प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन करना स्थानीय परंपराओं के विरुद्ध माना जाता रहा है।

पश्चिमी राजस्थान के ओरणों का सामाजिक और आर्थिक महत्व पशुपालक समुदायों के लिए बहुत बड़ा है। इन क्षेत्रों में घास, झाड़ियां, पेड़ और छोटे जल स्रोत मिलकर ऐसा पारिस्थितिकी तंत्र बनाते हैं, जो रेगिस्तान में पशुधन और वन्यजीवों को सहारा देता है। एक अध्ययन में यह भी बताया गया है कि राजस्थान के ओरण सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण हैं तथा पशुधन आधारित जीवनयापन करने वाले समुदायों के लिए जीवनरेखा की तरह काम करते हैं।

यही कारण है कि ओरण को सिर्फ धार्मिक स्थल या चारागाह के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। ये क्षेत्र जैव विविधता, स्थानीय अर्थव्यवस्था और पारंपरिक संरक्षण व्यवस्था के भी केंद्र हैं।

देगराई माता ओरण क्यों है महत्वपूर्ण?

सुमेर सिंह भाटी के संरक्षण कार्यों का प्रमुख केंद्र देगराई माता ओरण रहा है। जैसलमेर क्षेत्र का यह ओरण लंबे समय से स्थानीय समुदायों के लिए महत्वपूर्ण रहा है।

उपलब्ध रिपोर्टों और हालिया विवरणों के अनुसार लगभग 10,000 हेक्टेयर क्षेत्र को बचाने और संरक्षित रखने के प्रयासों में सुमेर सिंह भाटी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

इतने बड़े क्षेत्र की रक्षा करना किसी एक व्यक्ति के लिए आसान काम नहीं है। इसके लिए स्थानीय लोगों को साथ लाना, प्रशासन के सामने मुद्दे रखना, लोगों को जागरूक करना और लगातार मैदान में सक्रिय रहना पड़ता है।

सुमेर सिंह भाटी ने इसी सामुदायिक मॉडल को अपनाया।

20 गांवों को जोड़ने की कोशिश

ओरण संरक्षण का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि यह अभियान केवल एक गांव तक सीमित नहीं रहा।

सुमेर सिंह भाटी ने आसपास के लगभग 20 गांवों के लोगों को जोड़ने का प्रयास किया। इसके पीछे सोच यह थी कि यदि ओरण को बचाना है तो केवल एक व्यक्ति या एक गांव की आवाज पर्याप्त नहीं होगी। पूरे क्षेत्र के पशुपालकों और ग्रामीणों को एक साथ खड़ा होना होगा।

इसी प्रयास से Save Oran Padyatra यानी सेव ओरन पदयात्रा जैसे अभियान को गति मिली। इस पदयात्रा के माध्यम से जैसलमेर से जयपुर तक आवाज पहुंचाने और ओरण क्षेत्रों की समस्याओं को व्यापक स्तर पर उठाने का प्रयास किया गया।

यह आंदोलन सिर्फ जमीन बचाने का अभियान नहीं था। इसके पीछे स्थानीय लोगों की आजीविका, पशुधन, पारंपरिक संस्कृति और जैव विविधता को सुरक्षित रखने की चिंता भी थी।

ओरण के सामने कौन-कौन से खतरे हैं?

पश्चिमी राजस्थान के ओरण कई तरह के दबावों का सामना कर रहे हैं। इनमें भूमि उपयोग में बदलाव, अतिक्रमण और बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचे तथा ऊर्जा परियोजनाओं का विस्तार शामिल है।

विशेष रूप से पिछले कुछ वर्षों में राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों में सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाओं का विस्तार हुआ है। नवीकरणीय ऊर्जा देश के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन ऐसी परियोजनाओं की योजना बनाते समय स्थानीय पारिस्थितिकी और समुदायों के अधिकारों को ध्यान में रखना भी जरूरी है।

ओरण से संबंधित एक अध्ययन में भी बताया गया है कि इन क्षेत्रों को विशेष रूप से सोलर और विंड एनर्जी प्रोजेक्ट्स के बढ़ते दबाव तथा कानूनी स्थिति की अस्पष्टता जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

यही वह जगह है जहां सुमेर सिंह भाटी जैसे स्थानीय लोगों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। वे केवल बाहर से किसी किताब में पढ़कर इस क्षेत्र की समस्या नहीं समझते, बल्कि स्वयं उसी जमीन और पशुपालक जीवन से जुड़े हुए हैं।

बिजली की लाइनों और गोडावण का मुद्दा

जैसलमेर का ओरण क्षेत्र केवल पशुपालकों के लिए महत्वपूर्ण नहीं है। यह कई दुर्लभ वन्यजीवों और पक्षियों के लिए भी महत्वपूर्ण आवास है।

इनमें सबसे प्रमुख नाम है ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, जिसे हिंदी में सामान्यतः गोडावण कहा जाता है। यह भारत के सबसे गंभीर रूप से संकटग्रस्त पक्षियों में शामिल है और राजस्थान इसके महत्वपूर्ण प्राकृतिक आवासों में से एक है।

ओरण क्षेत्र में बिजली की ऊंची लाइनों से पक्षियों के टकराने का खतरा भी सामने आया है। BNHS की प्रकाशित सामग्री में सितंबर 2020 में देगराई माता ओरण के पास एक गोडावण की हाई-टेंशन बिजली लाइन से टकराकर मौत का उल्लेख है। उसी सामग्री में सुमेर सिंह भाटी द्वारा इस घटना की सूचना दिए जाने की बात भी दर्ज है।

इस घटना ने यह स्पष्ट किया कि रेगिस्तानी क्षेत्र में विकास परियोजनाओं और वन्यजीव संरक्षण के बीच संतुलन कितना जरूरी है।

गोडावण जमीन पर रहने वाला बड़ा पक्षी है। खुले घास के मैदान उसके लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इसलिए यदि घास के मैदान कम होते हैं या उनमें बिजली की लाइनें जैसी बाधाएं बढ़ती हैं, तो पक्षियों के लिए जोखिम भी बढ़ सकता है।

सुमेर सिंह भाटी का काम इस व्यापक पर्यावरणीय मुद्दे से भी जुड़ गया।

सिर्फ गोडावण ही नहीं, काराकल के संरक्षण में भी योगदान

जैसलमेर क्षेत्र में जैव विविधता केवल पक्षियों तक सीमित नहीं है। यहां कई दुर्लभ और कम दिखाई देने वाली वन्यजीव प्रजातियां भी मौजूद हैं।

सुमेर सिंह भाटी के काम से जुड़े हालिया विवरणों में एशियाई काराकल के दस्तावेजीकरण में उनके योगदान का भी उल्लेख किया गया है। काराकल एक मध्यम आकार की जंगली बिल्ली है, जो भारत के शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में पाई जाती है।

यह तथ्य इस बात को सामने लाता है कि ओरण जैसे क्षेत्र केवल पशुओं के चरने के लिए उपयोगी नहीं हैं। वे वन्यजीवों के लिए भी महत्वपूर्ण प्राकृतिक आवास हैं।

जब स्थानीय लोग अपने आसपास के जंगल, घास, जल स्रोत और वन्यजीवों को पहचानते हैं, तो वे संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण सूचना का स्रोत बन सकते हैं।

घास के मैदानों को बचाना क्यों जरूरी है?

पर्यावरण संरक्षण की चर्चा होते ही अक्सर पेड़ लगाने की बात सामने आती है। पेड़ लगाना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि हर पर्यावरणीय समस्या का समाधान केवल जंगल लगाने से हो सकता है।

घास के मैदान भी एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र हैं।

थार जैसे शुष्क क्षेत्र में स्थानीय घास और वनस्पतियां कम पानी में भी जीवित रहने के लिए अनुकूलित होती हैं। ये पौधे पशुओं को भोजन प्रदान करते हैं, मिट्टी को स्थिर रखने में मदद करते हैं और स्थानीय जैव विविधता को सहारा देते हैं।

घास के मैदानों में मौजूद वनस्पति वर्षा के पानी को जमीन में जाने में भी मदद कर सकती है। इससे मिट्टी की नमी और स्थानीय जल चक्र को सहारा मिलता है।

इसीलिए रेंजलैंड की बहाली का मतलब केवल सूखी जमीन पर घास उगा देना नहीं है। इसका मतलब है—पूरे प्राकृतिक तंत्र को दोबारा मजबूत करना।

पारंपरिक जल स्रोतों की भूमिका

राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों में पानी का महत्व किसी परिचय का मोहताज नहीं है। यहां पारंपरिक जल स्रोत सदियों से स्थानीय जीवन का हिस्सा रहे हैं।

ओरणों में मौजूद पारंपरिक जल स्रोत, जिन्हें स्थानीय रूप से अलग-अलग नामों से जाना जाता है, पशुपालकों और वन्यजीवों दोनों के लिए महत्वपूर्ण होते हैं।

सुमेर सिंह भाटी से जुड़े संरक्षण कार्यों में स्थानीय जल स्रोतों और चरागाहों के पुनर्जीवन का भी उल्लेख मिलता है। इन प्रयासों का सीधा संबंध पशुपालक समुदाय की आजीविका से है।

जब चरागाह बेहतर होते हैं और पानी उपलब्ध रहता है, तो पशुपालकों को अपने पशुओं को दूर तक ले जाने की जरूरत कम पड़ सकती है। इससे स्थानीय स्तर पर पशुपालन व्यवस्था को मजबूती मिलती है।

हजारों परिवारों और पशुओं से जुड़ा संरक्षण

उपलब्ध हालिया विवरणों में उनके संरक्षण प्रयासों को हजारों पशुपालक परिवारों और 50,000 से अधिक पशुओं के हित से जोड़ा गया है।

यह आंकड़ा केवल एक संख्या नहीं है। इसके पीछे हजारों परिवारों की रोजमर्रा की जिंदगी जुड़ी हुई है।

रेगिस्तानी राजस्थान में ऊंट, भेड़, बकरी और अन्य पशु ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। पशुधन से दूध, ऊन, परिवहन और अन्य आर्थिक लाभ मिलते हैं।

इसलिए चरागाहों की रक्षा करना वास्तव में ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रक्षा करना भी है।

ऊंट पालक से अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण चैंपियन तक

सुमेर सिंह भाटी की कहानी की सबसे खास बात यही है कि उनकी पहचान किसी बड़े शहर की प्रयोगशाला से नहीं बनी।

वह एक परंपरागत ऊंट पालक हैं।

उन्होंने अपने आसपास के पर्यावरण को अपने जीवन का हिस्सा बनाकर समझा। उन्होंने देखा कि चरागाह कमजोर होंगे तो पशुपालन प्रभावित होगा। जल स्रोत खत्म होंगे तो पशु और लोग दोनों प्रभावित होंगे। ओरण नष्ट होंगे तो वन्यजीवों का आवास भी घटेगा।

इसी स्थानीय अनुभव ने धीरे-धीरे उन्हें पर्यावरण संरक्षण के व्यापक अभियान से जोड़ दिया।

आज उनका काम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रेंजलैंड संरक्षण की चर्चा का हिस्सा बन गया है।

Rangeland Restoration Award 2026 क्या है?

वर्ष 2026 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने International Year of Rangelands and Pastoralists यानी IYRP 2026 के रूप में मनाने की पहल की है।

इसी व्यापक पहल के तहत रेंजलैंड और पशुपालक समुदायों की भूमिका को दुनिया के सामने लाने पर जोर दिया जा रहा है।

Rangeland Restoration Awards and Champions जैसे कार्यक्रमों का उद्देश्य उन लोगों और संगठनों को पहचान देना है जो घास के मैदानों और पशुपालक समुदायों के संरक्षण एवं बहाली के लिए वास्तविक स्तर पर काम कर रहे हैं।

2026 में सुमेर सिंह भाटी का सम्मान इसी संदर्भ में विशेष महत्व रखता है।

यह सम्मान केवल एक व्यक्ति की उपलब्धि नहीं है। इसे भारत के पारंपरिक पशुपालक समुदायों और राजस्थान के ओरणों की पर्यावरणीय भूमिका की अंतरराष्ट्रीय पहचान के रूप में भी देखा जा सकता है।

18 अगस्त 2026 को मंगोलिया में मिला सम्मान

18 अगस्त 2026 को मंगोलिया के उलानबटार में UNCCD COP17 से जुड़े Rangeland Restoration Champions कार्यक्रम में सुमेर सिंह भाटी को सम्मानित किया गया। ILRI द्वारा साझा किए गए कार्यक्रम विवरण में उनका नाम उन जमीनी स्तर के चैंपियनों में शामिल था जिन्हें सम्मानित किया गया।

यह अवसर इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि UNCCD COP17 में दुनिया भर में भूमि क्षरण, मरुस्थलीकरण और रेंजलैंड संरक्षण जैसे विषयों पर चर्चा हो रही थी।

मंगोलिया जैसे देश में, जहां पशुपालक समुदाय और विशाल घासभूमियां खुद पर्यावरण तथा अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, राजस्थान के एक ऊंट पालक का सम्मानित होना एक मजबूत अंतरराष्ट्रीय संदेश देता है।

इस सम्मान से राजस्थान को क्या संदेश मिलता है?

सुमेर सिंह भाटी का सम्मान राजस्थान के लिए कई मायनों में महत्वपूर्ण है।

पहला संदेश यह है कि स्थानीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

दूसरा संदेश यह है कि पर्यावरण संरक्षण केवल जंगलों तक सीमित नहीं है। घास के मैदान, चारागाह, ओरण और रेगिस्तानी पारिस्थितिकी तंत्र भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

तीसरा संदेश यह है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन जरूरी है।

सौर और पवन ऊर्जा जैसी परियोजनाएं देश के ऊर्जा भविष्य के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनका विस्तार स्थानीय पर्यावरण, वन्यजीवों और समुदायों की जरूरतों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।

ओरण संरक्षण की सबसे बड़ी ताकत—स्थानीय समुदाय

ओरणों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी सामुदायिक संरक्षण व्यवस्था है।

कई क्षेत्रों में स्थानीय लोग पीढ़ियों से जानते हैं कि किस क्षेत्र में पशु चरेंगे, कौन से पेड़ काटे नहीं जाएंगे और किन जल स्रोतों को सुरक्षित रखना है।

पश्चिमी राजस्थान के ओरणों पर किए गए अध्ययन भी बताते हैं कि स्थानीय समुदाय पारंपरिक नियमों और सामाजिक व्यवस्था के माध्यम से इन क्षेत्रों का संरक्षण करते रहे हैं।

सुमेर सिंह भाटी का काम इसी परंपरा को आधुनिक पर्यावरणीय विमर्श से जोड़ता है।

उनका संदेश सरल है—यदि किसी क्षेत्र की जमीन को वहां रहने वाले लोग पीढ़ियों से बचाते आए हैं, तो उनकी आवाज को संरक्षण और विकास की योजनाओं में जगह मिलनी चाहिए।

एक स्थानीय आंदोलन की राष्ट्रीय पहचान

ओरण बचाने का अभियान शुरुआत में स्थानीय समस्या जैसा दिखाई दे सकता था।

लेकिन जब 20 के आसपास गांवों के लोग जुड़े, पदयात्रा हुई, जैसलमेर से जयपुर तक मुद्दा पहुंचा और गोडावण जैसे संकटग्रस्त पक्षी का मामला सामने आया, तो यह मुद्दा व्यापक हो गया।

अब यही कहानी अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंच चुकी है।

यही किसी जमीनी आंदोलन की वास्तविक ताकत होती है। शुरुआत एक गांव से हो सकती है, लेकिन यदि समस्या व्यापक है और समाधान में समुदाय की भागीदारी है, तो उसकी आवाज दूर तक जा सकती है।

सुमेर सिंह भाटी की कहानी युवाओं के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?

आज पर्यावरण संरक्षण को लेकर युवाओं में जागरूकता बढ़ रही है। लेकिन कई बार पर्यावरण संरक्षण को केवल सोशल मीडिया पोस्ट, पौधारोपण अभियान या एक-दो दिन के कार्यक्रम तक सीमित समझ लिया जाता है।

सुमेर सिंह भाटी की कहानी एक अलग तस्वीर दिखाती है।

यह बताती है कि वास्तविक संरक्षण में लंबा समय, स्थानीय लोगों का विश्वास, लगातार प्रयास और जमीन पर मौजूद रहना जरूरी है।

उन्होंने जिस क्षेत्र को बचाने का प्रयास किया, वह उनके लिए कोई दूर का जंगल नहीं था। वह उनकी अपनी जीवनशैली, पशुधन और समुदाय से जुड़ा हुआ भू-दृश्य था।

यही कारण है कि उनकी कहानी पर्यावरण शिक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकती है।

दुनिया को क्या सीख मिलती है?

रेंजलैंड संरक्षण के संदर्भ में सुमेर सिंह भाटी का सम्मान एक बड़ी बात की ओर संकेत करता है—दुनिया के कई शुष्क क्षेत्रों में स्थानीय पशुपालक वास्तव में पर्यावरण के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

पशुपालकों को कई बार केवल प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करने वाले लोगों के रूप में देखा जाता है। लेकिन वास्तविकता अधिक जटिल है।

कई पारंपरिक पशुपालक समुदाय मौसम, पानी, वनस्पति और पशुओं के व्यवहार से संबंधित स्थानीय ज्ञान पीढ़ियों से आगे बढ़ाते आए हैं।

यदि इस ज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक अध्ययन और सरकारी संरक्षण नीतियों के साथ जोड़ा जाए तो रेंजलैंड की बहाली और बेहतर तरीके से की जा सकती है।

जंगल ही नहीं, घासभूमि भी बचानी होगी

जलवायु परिवर्तन और भूमि क्षरण की चर्चा के बीच अक्सर एक बात पीछे छूट जाती है—हर प्राकृतिक क्षेत्र का अपना महत्व है।

जंगलों की अपनी भूमिका है।

नदियों और wetlands की अपनी भूमिका है।

और उसी तरह घास के मैदानों की भी अपनी अलग भूमिका है।

थार के ओरण इस बात का जीवंत उदाहरण हैं।

यहां पेड़, झाड़ियां, घास, मिट्टी, पानी, पशुधन और वन्यजीव एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। किसी एक हिस्से को नुकसान पहुंचने पर उसका प्रभाव पूरे तंत्र पर पड़ सकता है।

इसीलिए सुमेर सिंह भाटी को मिला सम्मान केवल रेंजलैंड की बहाली का पुरस्कार नहीं माना जाना चाहिए। यह इस विचार की भी पहचान है कि प्रकृति संरक्षण का अर्थ हर तरह के प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को समझना और बचाना है।

निष्कर्ष

राजस्थान के जैसलमेर के पारंपरिक ऊंट पालक सुमेर सिंह भाटी की कहानी आज देश के लिए प्रेरणा का विषय बन गई है।

एक स्थानीय पशुपालक ने अपने आसपास के ओरण और चरागाहों की समस्या को समझा, लोगों को जोड़ा, संरक्षण आंदोलन को आगे बढ़ाया और जैसलमेर से जयपुर तक अपनी आवाज पहुंचाई। देगराई माता ओरण के संरक्षण, पशुपालक समुदाय की आजीविका, पारंपरिक जल स्रोतों और वन्यजीवों के संरक्षण से जुड़ा उनका काम अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहचान बना चुका है।

18 अगस्त 2026 को मंगोलिया में Rangeland Restoration Champions कार्यक्रम के दौरान उन्हें मिला Rangeland Restoration Award 2026 इसी लंबे प्रयास की अंतरराष्ट्रीय मान्यता है।

उनकी उपलब्धि हमें यह भी याद दिलाती है कि पर्यावरण संरक्षण के लिए हमेशा बड़े संसाधनों की जरूरत नहीं होती। कई बार किसी व्यक्ति का अपने क्षेत्र, अपनी जमीन और अपने समुदाय के प्रति जिम्मेदारी का भाव ही बड़े बदलाव की शुरुआत बन सकता है।

थार के रेगिस्तान में ऊंट चराने वाला एक पारंपरिक पशुपालक आज दुनिया को यह संदेश दे रहा है कि घास का एक मैदान भी उतना ही मूल्यवान हो सकता है जितना एक जंगल, और किसी स्थानीय समुदाय की आवाज भी अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण मंच तक पहुंच सकती है।

सुमेर सिंह भाटी को मिला यह सम्मान केवल राजस्थान या जैसलमेर की उपलब्धि नहीं है। यह उन तमाम पशुपालकों और स्थानीय समुदायों की पहचान है जो पीढ़ियों से प्रकृति के साथ तालमेल बनाकर जीवन जीते आए हैं।

और शायद यही इस कहानी की सबसे बड़ी सीख है—प्रकृति को बचाने की शुरुआत अक्सर वहीं से होती है, जहां लोग उसके साथ सबसे करीब से जुड़े होते हैं।


Post Verified & Reviewed by: Sarkari Samrat Team 

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