ब्रिटिश सत्ता का उदय, भू-राजस्व नीतियां एवं 1857 की क्रांति (British Rule & 1857 Revolt) || भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन एवं गांधीवादी युग (Indian National Movement)
ब्रिटिश सत्ता का उदय, भू-राजस्व नीतियां एवं 1857 की क्रांति (British Rule & 1857 Revolt)
प्लासी व बक्सर के युद्ध, स्थायी बंदोबस्त, रैयतवाड़ी व महालवाड़ी व्यवस्था तथा भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम
1. ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना के दो स्तंभ: प्लासी और बक्सर
भारत में व्यापार करने आई ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत की राजनीतिक कमजोरी का लाभ उठाकर धीरे-धीरे राजनीतिक सत्ता हथिया ली। इसकी शुरुआत बंगाल से हुई। दो अत्यंत निर्णायक युद्धों ने भारत का भविष्य बदल दिया: अब
- प्लासी का युद्ध (Battle of Plassey - 23 जून 1757): यह युद्ध बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला और रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना के बीच लड़ा गया था। क्लाइव ने सिराजुद्दौला के सेनापति मीर जाफर को रिश्वत देकर अपनी ओर मिला लिया, जिससे सिराजुद्दौला बिना लड़े ही हार गया और मारा गया। इस युद्ध ने बंगाल में ब्रिटिश शासन की केवल राजनीतिक नींव रखी।
- बक्सर का युद्ध (Battle of Buxar - 22 अक्टूबर 1764): यह युद्ध हेक्टर मुनरो के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना और भारत की संयुक्त सेना (बंगाल का अपदस्थ नवाब मीर कासिम, अवध का नवाब शुजाउद्दौला और मुगल सम्राट शाहआलम द्वितीय) के बीच लड़ा गया। इस युद्ध में अंग्रेजों ने संयुक्त भारतीय सेना को पूरी तरह पराजित कर दिया। इसके बाद 1765 में 'इलाहाबाद की संधि' हुई, जिसके द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा के दीवानी (राजस्व वसूलने के) अधिकार कानूनी रूप से मिल गए। इस युद्ध ने सिद्ध कर दिया कि अब भारत पर अंग्रेजों की वास्तविक संप्रभुता स्थापित हो चुकी है।
2. अंग्रेजों की तीन शोषक भू-राजस्व प्रणालियाँ
अंग्रेजों ने भारत का आर्थिक शोषण करने और अधिकतम राजस्व प्राप्त करने के लिए तीन अलग-अलग कृषि व्यवस्थाएं लागू कीं, जिन्होंने भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों को पूरी तरह बर्बाद कर दिया:-
1. स्थायी बंदोबस्त (Zamindari)
लागूकर्ता: लॉर्ड कॉर्नवालिस (1793 ई.)।
क्षेत्र: बंगाल, बिहार, उड़ीसा, वाराणसी (कुल ब्रिटिश भारत का 19% भाग)।
इसमें 'ज़मींदार' को भूमि का मालिक बनाया गया। ज़मींदार को निश्चित समय पर राजस्व चुकाना पड़ता था, अन्यथा 'सूर्यास्त नियम' (Sunset Law) के तहत उसकी ज़मींदारी नीलाम कर दी जाती थी। कुल वसूल राजस्व का 10/11 भाग अंग्रेजों को तथा 1/11 भाग ज़मींदार को मिलता था।
2. रैयतवाड़ी व्यवस्था (Ryotwari)
लागूकर्ता: थॉमस मुनरो और कैप्टन रीड (1820 ई.)।
क्षेत्र: मद्रास, बम्बई, असम (कुल ब्रिटिश भारत का 51% भाग - सर्वाधिक भाग)।
विशेष ध्यान दें - इसमें बिचौलियों (ज़मींदारों) को हटाकर सीधे 'रैयत' (किसान) को भूमि का मालिक माना गया और सीधे उनसे कर वसूला गया। इसकी दर बहुत उच्च (33% से 50%) थी, जिससे किसान अंततः महाजनों के कर्जजाल में फंस गए।
3. महालवाड़ी व्यवस्था (Mahalwari)
लागूकर्ता: हॉल्ट मैकेंजी (1822 ई.)।
क्षेत्र: पंजाब, उत्तर-पश्चिमी प्रांत, मध्य प्रांत (कुल ब्रिटिश भारत का 30% भाग)।
'महाल' शब्द का अर्थ 'गाँव' या 'जागीर' होता है। इस व्यवस्था में पूरे गाँव के साथ संयुक्त रूप से राजस्व का निर्धारण किया गया। गाँव का मुखिया (लंबरदार) सभी किसानों से कर वसूल कर ब्रिटिश सरकार को सौंपता था।
3. 1857 का महान विद्रोह (Revolt of 1857)
अंग्रेजों की आर्थिक शोषक नीतियों, डलहौजी की हड़प नीति (Doctrine of Lapse), वेलेजली की सहायक संधि, और भारतीयों के सामाजिक-धार्मिक जीवन में हस्तक्षेप के संचित असंतोष के विस्फोट के रूप में 1857 का महान विद्रोह उत्पन्न हुआ।
तात्कालिक कारण (Immediate Cause): सेना में पुरानी बंदूक 'ब्राउन बेस' के स्थान पर नई 'एनफील्ड राइफल' (Enfield Rifle) का प्रयोग शुरू किया गया था। इस राइफल के कारतूस को दांत से काटना पड़ता था, जिसमें 'गाय और सूअर की चर्बी' मिली होने की खबर फैल गई। इससे हिंदू और मुस्लिम दोनों सैनिकों की धार्मिक भावनाएं आहत हुईं।
शुरुआत: 29 मार्च 1857 को बैरकपुर छावनी (बंगाल) के 34वीं नेटिव इन्फैंट्री के सिपाही मंगल पांडे ने चर्बी वाले कारतूस का उपयोग करने से मना कर दिया और दो अंग्रेज अधिकारियों (बाघ और ह्यूसन) की हत्या कर दी। उन्हें 8 अप्रैल 1857 को फांसी दे दी गई। विद्रोह की औपचारिक शुरुआत 10 मई 1857 को मेरठ छावनी से हुई, जहाँ से सैनिकों ने विद्रोह कर दिल्ली कूच किया और मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र को अपना नेता घोषित किया।
🚨 परीक्षा केंद्र: प्रमुख विद्रोही केंद्र और भारतीय नेतृत्वकर्ता
| विद्रोह का केंद्र | भारतीय नेतृत्वकर्ता (Indian Leader) | दमन करने वाला ब्रिटिश अधिकारी |
|---|---|---|
| दिल्ली | बहादुर शाह ज़फ़र एवं जनरल बख्त खाँ | निकलसन (मारा गया), हडसन |
| कानपुर | नाना साहब (धोंडू पंत) एवं तात्या टोपे (रामचंद्र पांडुरंग) | कॉलिन कैंपबेल |
| लखनऊ | बेगम हज़रत महल (अवध की बेगम) | कॉलिन कैंपबेल |
| झांसी / ग्वालियर | रानी लक्ष्मीबाई (मणिकर्णिका) एवं तात्या टोपे | जनरल ह्यूरोज (जिसने लक्ष्मीबाई को "सोया हुआ अकेला मर्द" कहा) |
| बिहार (जगदीशपुर) | वीर कुंवर सिंह (80 वर्ष के वृद्ध जमींदार, बिहार के सिंह) | विलियम टेलर एवं विंसेंट आयर |
| इलाहाबाद / बनारस | लियाकत अली | कर्नल नील |
| फैजाबाद | मौलेवी अहमद उल्ला (जिन पर अंग्रेजों ने 50,000 रु का इनाम रखा था) | कर्नल नील |
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन एवं गांधीवादी युग (Indian National Movement)
कांग्रेस की स्थापना, बंग-भंग, क्रांतिकारी राष्ट्रवाद, गांधी जी के सत्याग्रह आंदोलन एवं पूर्ण स्वराज की लड़ाई
1. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) की स्थापना और प्रारंभिक दौर
भारतीय राष्ट्रवाद को एक औपचारिक संगठित आवाज देने के लिए 28 दिसंबर 1885 को बम्बई के 'गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज' में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (Indian National Congress) की स्थापना की गई। इसके संस्थापक एक सेवानिवृत्त ब्रिटिश प्रशासनिक अधिकारी ए. ओ. ह्यूम (Allan Octavian Hume) थे। इसके प्रथम अध्यक्ष व्योमेश चंद्र बनर्जी (W. C. Bonnerjee) थे और इसमें देश भर के 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया था। कांग्रेस की स्थापना के समय भारत के वायसराय लॉर्ड डफरिन थे, जिन्होंने कांग्रेस को "अल्पसंख्यकों की सूक्ष्म संस्था" कहकर मजाक उड़ाया था।
कांग्रेस के इतिहास को मुख्यतः तीन चरणों में विभाजित किया जाता है:
- उदारवादी चरण (Moderate Phase - 1885 से 1905 ई.): इस काल के प्रमुख नेता दादाभाई नौरोजी, फिरोजशाह मेहता, और गोपाल कृष्ण गोखले थे। वे 'प्रार्थना पत्र, याचिका और शिष्टमंडल' (Constitutional Methods) की नीति में विश्वास करते थे। दादाभाई नौरोजी ने अपनी पुस्तक 'Poverty and Un-British Rule in India' में 'धन के निष्कासन का सिद्धांत' (Drain of Wealth Theory) देकर सिद्ध किया कि अंग्रेज किस प्रकार भारत को आर्थिक रूप से खोखला कर रहे हैं।
- उग्रवादी चरण (Extremist Phase - 1905 से 1919 ई.): ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीति और 1905 के बंगाल विभाजन (लॉर्ड कर्जन द्वारा हिंदू-मुस्लिम एकता तोड़ने के लिए किया गया विभाजन) के विरोध में इस धड़े का उदय हुआ। इसके प्रमुख स्तंभ 'लाल-बाल-पाल' (लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, बिपिन चंद्र पाल) और अरविंद घोष थे। तिलक ने नारा दिया था- "स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा।" उन्होंने राष्ट्रवाद के प्रचार के लिए महाराष्ट्र में 'गणपति उत्सव' और 'शिवाजी उत्सव' प्रारंभ किया था।
- गांधीवादी चरण (Gandhian Phase - 1919 से 1947 ई.): यह राष्ट्रीय आंदोलन का सबसे व्यापक और जन-आंदोलन का युग था, जिसमें संपूर्ण भारत की जनता ने बढ़-चढ़कर भाग लिया।
2. गांधीवादी युग: सत्याग्रह और असहयोग से स्वतंत्रता तक
मोहनदास करमचंद गांधी दक्षिण अफ्रीका में 21 वर्ष रहने और वहाँ रंगभेद के खिलाफ सफल सत्याग्रह करने के बाद 9 जनवरी 1915 को भारत लौटे। इस पावन दिन की स्मृति में भारत में प्रतिवर्ष 'प्रवासी भारतीय दिवस' (Pravasi Bharatiya Divas) मनाया जाता है। गोपाल कृष्ण गोखले को गांधी जी का राजनीतिक गुरु माना जाता है।
गांधी जी के भारत में प्रमुख तीन प्रारंभिक क्षेत्रीय सत्याग्रह आंदोलन इस प्रकार थे, जो उनकी सफलता के कारण उन्हें राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित कर गए:
- चंपारण सत्याग्रह (Champaran - 1917, बिहार): यह गांधी जी का भारत में पहला सफल सत्याग्रह था। यहाँ किसानों को नील की खेती के लिए मजबूर करने वाली शोषक 'तीनकठिया प्रणाली' (3/20 भाग पर नील की खेती) लागू थी। बिहार के किसान नेता राजकुमार शुक्ल के निमंत्रण पर गांधी जी चंपारण गए और आंदोलन सफल कराया। इसी आंदोलन की सफलता से प्रभावित होकर रवींद्रनाथ टैगोर ने उन्हें 'महात्मा' की उपाधि दी थी।
- खेड़ा सत्याग्रह (Kheda - 1918, गुजरात): अकाल पड़ने के बावजूद ब्रिटिश सरकार किसानों से लगान वसूल रही थी। गांधी जी ने 'कर नहीं आंदोलन' चलाया और सफलता पाई।
- अहमदाबाद मिल हड़ताल (Ahmedabad Mill Strike - 1918): यहाँ प्लेग बोनस को लेकर मिल मालिकों और मजदूरों में विवाद था। गांधी जी ने मजदूरों के समर्थन में भारत में पहली बार 'भूख हड़ताल' (Hunger Strike) की और मालिकों को 35% बोनस देने पर राजी किया।
🔥 परीक्षा का हॉटस्पॉट: गांधी जी के तीन सबसे बड़े राष्ट्रव्यापी जन-आंदोलन
1. असहयोग आंदोलन (Non-Cooperation Movement - 1920-1922):
रॉलेट एक्ट (बिना दलील, बिना वकील, बिना अपील का कानून), 13 अप्रैल 1919 के बर्बर 'जलियांवाला बाग हत्याकांड' और खिलाफत आंदोलन के उत्तर में गांधी जी ने 1 अगस्त 1920 को असहयोग आंदोलन शुरू किया। इसके तहत सरकारी नौकरियों, विदेशी कपड़ों, अदालतों और स्कूलों का पूर्ण बहिष्कार किया गया। परंतु 5 फरवरी 1922 को गोरखपुर (यूपी) के 'चौरी-चौरा' नामक स्थान पर उग्र भीड़ ने एक थाने में आग लगा दी जिससे 22 पुलिसकर्मी जिंदा जल गए। इस हिंसक घटना से आहत होकर गांधी जी ने 12 फरवरी 1922 को इस आंदोलन को वापस ले लिया।
2. सविनय अवज्ञा आंदोलन और डांडी मार्च (Civil Disobedience - 1930):
अंग्रेजों के नमक एकाधिकार और शोषक नमक कर को तोड़ने के लिए गांधी जी ने अपने 78 विश्वसनीय स्वयंसेवकों के साथ साबरमती आश्रम से समुद्रतटीय गाँव डांडी (गुजरात) तक 'डांडी मार्च' शुरू किया। यह यात्रा 12 मार्च से 6 अप्रैल 1930 तक (24 दिन, 241 मील) चली। 6 अप्रैल को नमक बनाकर उन्होंने सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत की। इसी आंदोलन के दबाव में वर्ष 1931 में 'गांधी-इरविन समझौता' हुआ और वे लंदन में आयोजित 'द्वितीय गोलमेज सम्मेलन' (Second Round Table Conference) में भाग लेने गए। वे कांग्रेस के एकमात्र ऐसे प्रतिनिधि थे जिन्होंने किसी गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया था।
3. भारत छोड़ो आंदोलन (Quit India Movement - 1942):
क्रिप्स मिशन की असफलता के बाद, द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बम्बई के ग्वालिया टैंक मैदान (क्रांति मैदान) से 8 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन का ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किया गया। गांधी जी ने इसी मंच से देश की जनता को अपना सबसे प्रसिद्ध नारा "करो या मरो" (Do or Die) दिया। 9 अगस्त की सुबह ही अंग्रेजों ने 'ऑपरेशन ज़ीरो ऑवर' (Operation Zero Hour) चलाकर गांधी जी सहित सभी बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया (गांधी जी को पूना के आगा खाँ पैलेस में रखा गया)। नेतृत्वविहीन होने के बावजूद यह आंदोलन स्वतःस्फूर्त रूप से अत्यंत उग्र और हिंसक तरीके से पूरे भारत में फैल गया, जिसने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव पूरी तरह हिला दी। अंततः 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ।
⭐ परीक्षा में बार-बार पूछे जाने वाले प्रमुख कांग्रेस अधिवेशन (Landmark INC Sessions)
| अधिवेशन वर्ष | स्थान | अध्यक्ष (President) | विशेषता / ऐतिहासिक महत्व (Key Accomplishment) |
|---|---|---|---|
| 1896 ई. | कलकत्ता | रहीमतुल्ला सयानी | भारत का राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' (बंकिम चंद्र चटर्जी रचित) पहली बार गाया गया। |
| 1907 ई. | सूरत | डॉ. रासबिहारी घोष | कांग्रेस का पहला विभाजन हुआ - नरम दल और गरम दल अलग हो गए (सूरत स्प्लिट)। |
| 1911 ई. | कलकत्ता | पंडित बिशन नारायण धर | भारत का राष्ट्रीय गान 'जन गण मन' (रवींद्रनाथ टैगोर रचित) पहली बार गाया गया। |
| 1916 ई. | लखनऊ | अंबिका चरण मजूमदार | 'लखनऊ समझौता' (Lucknow Pact) - नरम और गरम दल का आपस में विलय तथा कांग्रेस व मुस्लिम लीग के बीच समझौता। |
| 1917 ई. | कलकत्ता | श्रीमती एनी बेसेंट | कांग्रेस की प्रथम महिला अध्यक्ष बनने का गौरव प्राप्त हुआ (आयरिश महिला)। |
| 1924 ई. | बेलगाँव (कर्नाटक) | महात्मा गांधी | गांधी जी ने अपने जीवन में केवल एक बार कांग्रेस के इस अधिवेशन की अध्यक्षता की थी। |
| 1925 ई. | कानपुर | श्रीमती सरोजिनी नायडू | कांग्रेस की प्रथम भारतीय महिला अध्यक्ष बनीं। |
| 1929 ई. | लाहौर (रावी नदी तट) | जवाहरलाल नेहरू | ऐतिहासिक 'पूर्ण स्वराज' (Complete Independence) का प्रस्ताव पारित। 26 जनवरी 1930 को पहला स्वतंत्रता दिवस मनाने का निश्चय किया गया (इसीलिए 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस घोषित किया गया)। |
| 1931 ई. | कराची | सरदार वल्लभभाई पटेल | 'मौलिक अधिकारों' (Fundamental Rights) का पहला प्रस्ताव पारित किया गया। |
| 1938 ई. | हरिपुरा (गुजरात) | नेताजी सुभाष चंद्र बोस | राष्ट्रीय योजना समिति (National Planning Committee) का गठन। |
बोनस प्वाइंट Current Affairs
अंतर्राष्ट्रीय न्याय दिवस
• 17 जुलाई को अंतर्राष्ट्रीय न्याय दिवस (World Day for International Justice) मनाया जाता है।
• 17 जुलाई 1998 को रोम संविधि (Rome Statute) को अपनाया गया।
• रोम संविधि लागू हुई 1 जुलाई 2002 से।
• आईसीसी (International Criminal Court - ICC) की स्थापना 1 जुलाई 2002 को रोम संविधि के तहत हुई।
• इसका मुख्यालय: हेग (The Hague), नीदरलैंड।
• इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर न्याय, मानवाधिकार और कानून के शासन (Rule of Law) को बढ़ावा देना।
आईसीसी किन अपराधों की सुनवाई करता है?
o नरसंहार (Genocide)
o मानवता के विरुद्ध अपराध (Crimes against Humanity)
o युद्ध अपराध (War Crimes)
o आक्रामकता का अपराध (Crime of Aggression)
• आईसीसी किस पर मुकदमा चलाता है? केवल व्यक्तियों (Individuals) पर, किसी देश या सरकार पर नहीं।
• भारत रोम संविधि का पक्षकार (State Party) नहीं है, इसलिए भारत ICC का सदस्य नहीं है।
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