संघ, नागरिकता, मौलिक अधिकार, नीति निदेशक तत्व व मौलिक कर्तव्य (Articles 1-51A)
संघ, नागरिकता, मौलिक अधिकार, नीति निदेशक तत्व व मौलिक कर्तव्य (Articles 1-51A)
भारतीय भूभाग, एकल नागरिकता के नियम, छह मौलिक अधिकार, रिट अधिकार और कल्याणकारी राज्य के दार्शनिक आधारों का अनुच्छेदवार विवरण
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दोस्तों यह पोस्ट उन विद्यार्थियों के लिए लिखा गया है जो कॉम्पिटेटिव एक्जाम या कोई अन्य एग्जाम की तैयारी करते हैं Ex :- UPSC, BPSC, SSC, UPPSC, Railway, Banking, Teacher etc. पूरा जरूर पढ़े
1. संघ और उसका राज्य क्षेत्र (भाग 1 - अनुच्छेद 1 से 4)
- **अनुच्छेद 1:** स्पष्ट रूप से घोषित करता है कि *"भारत, अर्थात इंडिया, राज्यों का एक संघ (Union of States) होगा।"* भारत 'विनाशी राज्यों का अविनाशी संघ' है।
- **अनुच्छेद 2:** संसद को नए राज्यों को भारत संघ में प्रवेश कराने या नए राज्यों की स्थापना करने का अधिकार देता है (जैसे 1975 में सिक्किम का प्रवेश)।
- **अनुच्छेद 3:** संसद को किसी राज्य के क्षेत्र को बढ़ाने, घटाने, सीमाओं में परिवर्तन करने अथवा नए राज्यों के निर्माण और उनके नामों में परिवर्तन करने का अधिकार साधारण बहुमत से देता है।
- **अनुच्छेद 4:** घोषित करता है कि अनुच्छेद 2 और 3 के अंतर्गत बनाए गए नियमों को अनुच्छेद 368 के तहत संविधान संशोधन नहीं माना जाएगा।
2. नागरिकता (भाग 2 - अनुच्छेद 5 से 11)
भारत में ब्रिटेन की भांति **एकल नागरिकता (Single Citizenship)** है। संसद ने इस विषय पर **'नागरिकता अधिनियम, 1955'** पारित किया था, जिसके तहत नागरिकता प्राप्ति के 5 तरीके (जन्म, वंश, पंजीकरण, प्राकृतिक रूप से व क्षेत्र समावेशन) और समाप्ति के 3 तरीके (त्याग, बर्खास्तगी और नागरिकता से वंचित करना) हैं।
3. छह मौलिक अधिकार (भाग 3 - अनुच्छेद 12 से 35)
मौलिक अधिकार संयुक्त राज्य अमेरिका से प्रेरित हैं। ये **वाद-योग्य (Justiciable)** हैं और राज्य की निरंकुशता पर अंकुश लगाते हैं। मूल रूप से सात अधिकार थे परंतु 44वें संशोधन (1978) द्वारा संपत्ति के अधिकार को हटाकर अनुच्छेद 300A के तहत कानूनी अधिकार बना दिया गया। वर्तमान में 6 मौलिक अधिकार हैं:
- समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14 से 18):
- *अनुच्छेद 14:* विधि के समक्ष समता और विधि का समान संरक्षण।
- *अनुच्छेद 15:* धर्म, जाति, लिंग, जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध।
- *अनुच्छेद 16:* लोक नियोजन (सरकारी नौकरियों) में अवसर की समानता।
- *अनुच्छेद 17:* **अस्पृश्यता का अंत (Abolition of Untouchability)** - यह पूर्ण अधिकार है जिसका उल्लंघन दंडनीय है।
- *अनुच्छेद 18:* उपाधियों का अंत (सैन्य व शैक्षणिक उपाधियों को छोड़कर)। - स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19 से 22):
- *अनुच्छेद 19:* छह लोकतांत्रिक स्वतंत्रताओं (अभिव्यक्ति, शांतिपूर्ण सभा, संघ गठन, निर्बाध संचरण, निवास और आजीविका) की गारंटी। 19(1)(a) में 'प्रेस की स्वतंत्रता' शामिल है।
- *अनुच्छेद 20:* अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण (दोहरे दंड से मुक्ति तथा स्वयं के खिलाफ गवाही न देने का संरक्षण)।
- *अनुच्छेद 21:* **प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण (Protection of Life & Personal Liberty)** - गरिमापूर्ण जीवन जीने और निजता (Privacy) का अधिकार।
- *अनुच्छेद 21A:* **शिक्षा का अधिकार (RTE)** - 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा (86वें संशोधन 2002 द्वारा शामिल)।
- *अनुच्छेद 22:* गिरफ्तारी और निरोध से संरक्षण (24 घंटे में मजिस्ट्रेट के समक्ष पेशी का अधिकार)। - शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23 व 24):
- *अनुच्छेद 23:* मानव अंगों की तस्करी, बेगार और जबरन श्रम (Forced Labour) पर प्रतिबंध।
- *अनुच्छेद 24:* **बाल श्रम का निषेध** - 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को कारखानों या अन्य खतरनाक उद्योगों में नियोजन पर प्रतिबंध। - धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25 से 28):
- *अनुच्छेद 25:* अंतःकरण की स्वतंत्रता और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण व प्रचार करने की स्वतंत्रता (सिखों द्वारा कृपाण धारण करना शामिल)।
- *अनुच्छेद 26:* धार्मिक मामलों के प्रबंध की स्वतंत्रता।
- *अनुच्छेद 27:* किसी विशेष धर्म की उन्नति के लिए कर (Tax) भुगतान से मुक्ति।
- *अनुच्छेद 28:* राजकीय शिक्षण संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा देने पर रोक। - संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार (अनुच्छेद 29 व 30):
- *अनुच्छेद 29:* अल्पसंख्यकों के हितों, भाषा, लिपि और संस्कृति का संरक्षण।
- *अनुच्छेद 30:* अल्पसंख्यक वर्गों को शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और उनके प्रशासन का अधिकार। - संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32):
डॉ. भीमराव अंबेडकर ने इसे **'संविधान का हृदय और आत्मा'** कहा था। मौलिक अधिकारों के हनन होने पर सीधे सर्वोच्च न्यायालय जाने का अधिकार देता है। इसके तहत सर्वोच्च न्यायालय **5 प्रकार की रिट** जारी कर सकता है:
1. **बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus)** - अवैध रूप से हिरासत में लिए गए व्यक्ति को मुक्त कराना।
2. **परमादेश (Mandamus)** - लोक अधिकारी को अपना कानूनी कर्तव्य निभाने का आदेश देना।
3. **प्रतिषेध (Prohibition)** - अधीनस्थ न्यायालय को अधिकार क्षेत्र से बाहर काम करने से रोकना।
4. **उत्प्रेषण (Certiorari)** - अधीनस्थ न्यायालय से मुकदमे को उच्च न्यायालय में स्थानांतरित करना।
5. **अधिकार पृच्छा (Quo Warranto)** - किसी व्यक्ति द्वारा अवैध रूप से सार्वजनिक पद हथियाने की जांच करना।
4. राज्य के नीति निदेशक तत्व (भाग 4 - अनुच्छेद 36 से 51)
ये आयरलैंड से लिए गए हैं और **गैर-वादयोग्य (Non-Justiciable)** हैं, जिसका अर्थ है कि इनके हनन होने पर सीधे न्यायालय नहीं जाया जा सकता। इनका उद्देश्य भारत में एक **'कल्याणकारी राज्य' (Welfare State)** की स्थापना करना और सामाजिक-आर्थिक लोकतंत्र को सुदृढ़ करना है:
- **अनुच्छेद 38:** लोक कल्याण की अभिवृद्धि के लिए सामाजिक व्यवस्था और आर्थिक समानता।
- **अनुच्छेद 39A:** गरीबों के लिए समान न्याय और **मुफ्त कानूनी सहायता** (Equal Justice & Free Legal Aid)।
- **अनुच्छेद 39(d):** पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए **'समान कार्य के लिए समान वेतन'**।
- **अनुच्छेद 40:** **ग्राम पंचायतों का संगठन** (गांधीवादी दर्शन का मुख्य स्तंभ)।
- **अनुच्छेद 44:** **समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code - UCC)** - पूरे देश के लिए समान नागरिक कानून।
- **अनुच्छेद 45:** 6 वर्ष से कम आयु के बच्चों की प्रारंभिक बाल्यावस्था देखरेख और अनिवार्य शिक्षा का निर्देश।
- **अनुच्छेद 48A:** **पर्यावरण का संरक्षण, संवर्धन और वन्यजीवों की रक्षा**।
- **अनुच्छेद 50:** **कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण** (Separation of Judiciary from Executive)।
- **अनुच्छेद 51:** **अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि** और भारत की विदेश नीति का मूल आधार।
5. मौलिक कर्तव्य (भाग 4A - अनुच्छेद 51A)
मूल संविधान में मौलिक कर्तव्य नहीं थे। इन्हें इंदिरा गांधी शासनकाल में **'सरदार स्वर्ण सिंह समिति' (1976)** की सिफारिशों के आधार पर **42वें संविधान संशोधन (1976)** द्वारा जोड़ा गया। ये सोवियत संघ (पूर्व USSR) से प्रेरित हैं।
- प्रारंभ में इनकी संख्या **10** थी।
- वर्तमान में कुल **11 मौलिक कर्तव्य** हैं। 11वां मौलिक कर्तव्य **86वें संविधान संशोधन (2002)** द्वारा जोड़ा गया, जो प्रत्येक माता-पिता/अभिभावक का यह कर्तव्य बनाता है कि वे 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को शिक्षा के अवसर प्रदान करें।
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