भारतीय राजव्यवस्था (Indian Polity) मास्टर वन-लाइनर पोस्ट

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भारतीय राजव्यवस्था (Indian Polity) मास्टर वन-लाइनर पोस्ट

कुल तथ्य: 125

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दोस्तों यह पोस्ट उन विद्यार्थियों के लिए लिखा गया है जो कॉम्पिटेटिव एक्जाम या कोई अन्य एग्जाम की तैयारी करते हैं Ex :- UPSC, BPSC, SSC, UPPSC, Railway, Banking, Teacher etc.


1. [संविधान सभा एवं निर्माण] - कैबिनेट मिशन योजना (1946) के तहत भारत में संविधान सभा का गठन किया गया था।

   व्याख्या: कैबिनेट मिशन में ब्रिटिश सरकार के तीन मंत्री- लॉर्ड पैथिक लॉरेंस, सर स्टेफोर्ड क्रिप्स और ए.वी. अलेक्जेंडर शामिल थे। इस योजना के तहत संविधान सभा के कुल सदस्यों की संख्या 389 निर्धारित की गई थी, जिसमें से 292 प्रांतों से, 93 देशी रियासतों से और 4 मुख्य आयुक्त के प्रांतों से चुने जाने थे।


2. [संविधान सभा एवं निर्माण] - संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को हुई थी, जिसकी अध्यक्षता डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा ने की थी।

   व्याख्या: डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा को सभा के सबसे वरिष्ठ सदस्य होने के कारण 'अस्थायी अध्यक्ष' चुना गया था। यह परंपरा फ्रांसीसी पद्धति पर आधारित थी। इस बैठक का मुस्लिम लीग ने पूरी तरह बहिष्कार किया और अलग पाकिस्तान की मांग उठाई, जिसके कारण बैठक में केवल 211 सदस्यों ने भाग लिया था।


3. [संविधान सभा एवं निर्माण] - डॉ. राजेंद्र प्रसाद को 11 दिसंबर 1946 को संविधान सभा का स्थायी अध्यक्ष निर्वाचित किया गया था।

   व्याख्या: अध्यक्ष के साथ-साथ एच.सी. मुखर्जी को सभा का उपाध्यक्ष और सर बी.एन. राव को संवैधानिक सलाहकार (Constitutional Advisor) नियुक्त किया गया था। बी.एन. राव ने ही संविधान का पहला कच्चा प्रारूप (Draft) तैयार किया था जिस पर बाद में प्रारूप समिति ने विचार किया।


4. [संविधान सभा एवं निर्माण] - पं. जवाहरलाल नेहरू ने 13 दिसंबर 1946 को संविधान सभा में ऐतिहासिक 'उद्देश्य प्रस्ताव' (Objective Resolution) पेश किया था।

   व्याख्या: इस प्रस्ताव ने भारतीय संविधान की दार्शनिक और संरचनात्मक नींव रखी। इसे संविधान सभा द्वारा 22 जनवरी 1947 को सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया गया था, और यही उद्देश्य प्रस्ताव आगे चलकर भारतीय संविधान की 'प्रस्तावना' (Preamble) का मुख्य आधार बना।


5. [संविधान सभा एवं निर्माण] - संविधान के प्रारूप पर विचार करने हेतु 29 अगस्त 1947 को डॉ. बी.आर. अंबेडकर की अध्यक्षता में सात सदस्यीय 'प्रारूप समिति' (Drafting Committee) का गठन किया गया था।

   व्याख्या: प्रारूप समिति के अन्य छह सदस्य एन. गोपालस्वामी आयंगर, अल्लादि कृष्णस्वामी अय्यर, डॉ. के.एम. मुंशी, सैयद मोहम्मद सादुल्लाह, एन. माधव राव (बी.एल. मित्र के स्थान पर) और टी.टी. कृष्णमाचारी (डी.पी. खेतान की मृत्यु के बाद) थे। अंबेडकर जी को संविधान का जनक माना जाता है।


6. [संविधान सभा एवं निर्माण] - भारतीय संविधान को तैयार होने में कुल 2 वर्ष, 11 माह और 18 दिन का समय लगा था।

   व्याख्या: इस लंबी अवधि के दौरान संविधान सभा के कुल 11 सत्र (Sessions) आयोजित किए गए थे और संविधान निर्माताओं ने लगभग 60 देशों के संविधानों का गहन अध्ययन किया था। इसके प्रारूप पर कुल 114 दिनों तक गंभीर विचार-विमर्श हुआ था और इसे बनाने में लगभग 64 लाख रुपये का खर्च आया था।


7. [संविधान सभा एवं निर्माण] - संविधान सभा द्वारा संविधान को 26 नवंबर 1949 को अंगीकार, अधिनियमित और आत्मार्पित (Adopted) किया गया था।

   व्याख्या: इस ऐतिहासिक दिन नागरिकता, चुनाव, अस्थायी संसद और संक्रमणकालीन प्रावधानों से जुड़े कुछ अनुच्छेदों (जैसे अनुच्छेद 5, 6, 7, 8, 9, 60, 324, 366, 379, 380 आदि) को तुरंत लागू कर दिया गया था। शेष संविधान को पूर्ण रूप से 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया था।


8. [संविधान सभा एवं निर्माण] - 26 जनवरी को संविधान लागू करने का कारण वर्ष 1930 का 'पूर्ण स्वराज दिवस' मनाना था।

   व्याख्या: दिसंबर 1929 के लाहौर अधिवेशन में रावी नदी के तट पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज्य का संकल्प लिया था और घोषणा की थी कि प्रत्येक वर्ष 26 जनवरी को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाएगा। इसी ऐतिहासिक महत्व को बनाए रखने के लिए गणतंत्र दिवस हेतु इस तिथि को चुना गया।


9. [संविधान सभा एवं निर्माण] - संविधान सभा की अंतिम बैठक 24 जनवरी 1950 को हुई थी, जिसमें कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए।

   व्याख्या: इसी दिन डॉ. राजेंद्र प्रसाद को भारत का प्रथम राष्ट्रपति चुना गया। साथ ही, जन-गण-मन को राष्ट्रगान और वंदे मातरम को राष्ट्रगीत के रूप में आधिकारिक तौर पर अपनाया गया। संविधान सभा को भंग कर उसे 1951-52 के आम चुनावों तक भारत की अंतरिम संसद में बदल दिया गया।


10. [संविधान सभा एवं निर्माण] - प्रेम बिहारी नारायण रायजादा भारतीय संविधान के मूल संस्करण के मुख्य कैलिग्राफर (सुलेखक) थे।

   व्याख्या: उन्होंने संपूर्ण संविधान को अपने हाथों से सुंदर तिरछे अक्षरों (Flowing Italic Style) में अंग्रेजी में लिखा था। इसके हिंदी संस्करण का सुलेखन वसंत कृष्ण वैद्य द्वारा किया गया था। संविधान के प्रत्येक पृष्ठ के किनारों को शांतिनिकेतन के प्रसिद्ध कलाकारों (जैसे नंदलाल बोस और राममनोहर सिन्हा) ने सजाया था।


11. [प्रस्तावना एवं विशेषताएं] - प्रस्तावना को संविधान की 'आत्मा', 'कुंजी' तथा 'जन्मकुंडली' (Horoscope) कहा जाता है।

   व्याख्या: प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ के.एम. मुंशी ने इसे 'संवैधानिक प्रजातंत्र की जन्मकुंडली' कहा था, जबकि ठाकुरदास भार्गव ने इसे 'संविधान का सबसे सम्मानित भाग और उसकी आत्मा' कहा था। एन.ए. पालकीवाला ने प्रस्तावना को संविधान का 'परिचय पत्र' (Identity Card of the Constitution) करार दिया था।


12. [प्रस्तावना एवं विशेषताएं] - प्रस्तावना में अब तक केवल एक बार 42वें संविधान संशोधन अधिनियम (1976) द्वारा संशोधन किया गया है।

   व्याख्या: इस ऐतिहासिक संशोधन के माध्यम से प्रस्तावना में तीन नए महत्वपूर्ण शब्द जोड़े गए थे- 'समाजवादी' (Socialist), 'पंथनिरपेक्ष' (Secular) और 'अखंडता' (Integrity)। इस संशोधन को 'लघु संविधान' (Mini Constitution) भी कहा जाता है क्योंकि इसने संविधान में व्यापक बदलाव किए थे।


13. [प्रस्तावना एवं विशेषताएं] - केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य मामले (1973) में सुप्रीम कोर्ट ने प्रस्तावना को संविधान का अंग माना।

   व्याख्या: इस ऐतिहासिक 13 न्यायाधीशों की पीठ ने बेरुबारी यूनियन मामले (1960) के अपने फैसले को पलट दिया और कहा कि संसद प्रस्तावना में संशोधन कर सकती है, बशर्ते वह संविधान के 'मूल ढांचे' (Basic Structure) को नष्ट या परिवर्तित न करे। मूल ढांचे की अवधारणा इसी वाद में प्रतिपादित हुई थी।


14. [प्रस्तावना एवं विशेषताएं] - प्रस्तावना में भारतीय नागरिकों के लिए तीन प्रकार के न्याय, पांच प्रकार की स्वतंत्रता और दो प्रकार की समता की बात कही गई है।

   व्याख्या: न्याय: सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक (रूसी क्रांति से प्रेरित)। स्वतंत्रता: विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की। समता: प्रतिष्ठा और अवसर की। इनके साथ ही 'बंधुत्व' बढ़ाने का संकल्प है जो व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता व अखंडता सुनिश्चित करे (फ्रांसीसी क्रांति से प्रेरित)।


15. [प्रस्तावना एवं विशेषताएं] - भारतीय संविधान का सर्वाधिक भाग भारत शासन अधिनियम, 1935 से लिया गया है।

   व्याख्या: हमारे संविधान के लगभग दो-तिहाई प्रावधान (जैसे संघीय व्यवस्था, राज्यपाल का कार्यालय, न्यायपालिका का ढांचा, लोक सेवा आयोग और आपातकालीन उपबंध) प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इसी अधिनियम से ग्रहण किए गए हैं। इसी कारण इसे संविधान का ब्लूप्रिंट भी कहा जाता है।


16. [प्रस्तावना एवं विशेषताएं] - संसदीय शासन प्रणाली और कानून के शासन (Rule of Law) की संकल्पना ब्रिटिश संविधान से ली गई है।

   व्याख्या: ब्रिटेन से एकल नागरिकता, द्विसदनीय व्यवस्था, विधायी प्रक्रिया, सर्वाधिक मत के आधार पर चुनाव जीत का निर्णय (First Past the Post), तथा संसदीय विशेषाधिकार भी लिए गए हैं। भारतीय संसदीय प्रणाली में प्रधानमंत्री वास्तविक कार्यकारी प्रमुख होता है।


17. [प्रस्तावना एवं विशेषताएं] - मूल अधिकार, न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) और न्यायपालिका की स्वतंत्रता अमेरिकी संविधान से प्रेरित हैं।

   व्याख्या: अमेरिका के संविधान से राष्ट्रपति पर महाभियोग की प्रक्रिया, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायाधीशों को पद से हटाने की विधि, तथा उपराष्ट्रपति का पद भी लिया गया है। अमेरिकी न्यायपालिका के विपरीत, भारत में एकीकृत न्याय प्रणाली के साथ न्यायिक सर्वोच्चता और संसदीय संप्रभुता का संतुलन है।


18. [प्रस्तावना एवं विशेषताएं] - संविधान संशोधन की प्रक्रिया दक्षिण अफ्रीका के संविधान से ली गई है।

   व्याख्या: संविधान के भाग 20 के अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संसद को संविधान में संशोधन की शक्ति प्रदान की गई है। इसके साथ ही, राज्यसभा के सदस्यों का निर्वाचन भी दक्षिण अफ्रीका के संविधान से ही ग्रहण किया गया है (जबकि राज्यसभा में सदस्यों का नामांकन आयरलैंड से लिया गया है)।


19. [नागरिकता एवं संघ राज्य क्षेत्र] - अनुच्छेद 1 स्पष्ट करता है कि 'भारत, अर्थात इंडिया, राज्यों का एक संघ (Union of States) होगा'।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 1

   व्याख्या: इसका तात्पर्य यह है कि भारतीय संघ राज्यों के बीच किसी समझौते का परिणाम नहीं है (जैसा कि अमेरिका में है) और किसी भी राज्य को संघ से अलग होने का अधिकार नहीं है। इसी कारण भारतीय राज्यों को 'विनाशी राज्यों का अविनाशी संघ' कहा जाता है।


20. [नागरिकता एवं संघ राज्य क्षेत्र] - संसद के पास अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के निर्माण, नाम, सीमा या क्षेत्र में परिवर्तन की पूर्ण शक्ति है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 3

   व्याख्या: इस प्रक्रिया हेतु राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से विधेयक संसद में पेश किया जाता है। संबंधित राज्य की विधानसभा को केवल राय देने का अधिकार होता है, जिसे मानने के लिए संसद बाध्य नहीं है। ऐसे विधेयक साधारण बहुमत से पारित किए जा सकते हैं (अनुच्छेद 4 के तहत इसे संविधान संशोधन नहीं माना जाता)।


21. [नागरिकता एवं संघ राज्य क्षेत्र] - भाषाई आधार पर गठित होने वाला भारत का पहला राज्य आंध्र प्रदेश (1953) था।

   व्याख्या: स्वतंत्रता के बाद देश में भाषाई आधार पर राज्यों के गठन की तीव्र मांग उठी। प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी पोट्टी श्रीरामुलु के 56 दिनों के आमरण अनशन और मृत्यु के बाद सरकार को विवश होकर मद्रास से अलग कर तेलुगु भाषी लोगों के लिए आंध्र प्रदेश का गठन करना पड़ा।


22. [नागरिकता एवं संघ राज्य क्षेत्र] - राज्य पुनर्गठन आयोग (1953) की सिफारिशों पर 1956 में देश को 14 राज्यों और 6 केंद्र शासित प्रदेशों में बांटा गया था।

   व्याख्या: इस तीन सदस्यीय आयोग के अध्यक्ष फजल अली थे, जबकि अन्य दो सदस्य के.एम. पणिक्कर और एच.एन. कुंजरू थे। आयोग ने एक राज्य एक भाषा के सिद्धांत को खारिज कर दिया था, लेकिन भाषाई कारक को पुनर्गठन का एक बड़ा आधार स्वीकार किया था। इसके आधार पर 7वां संविधान संशोधन पारित किया गया।


23. [नागरिकता एवं संघ राज्य क्षेत्र] - संविधान के भाग 2 के अनुच्छेद 5 से 11 तक भारत में एकल नागरिकता (Single Citizenship) का प्रावधान है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 5-11

   व्याख्या: भारत में केवल 'देश की नागरिकता' होती है, राज्यों की अलग नागरिकता नहीं होती (जैसा कि अमेरिका या स्विट्जरलैंड में है)। यह संघवाद को मजबूत बनाने और क्षेत्रीय भेदभाव को मिटाने के लिए अपनाया गया था। नागरिकता से जुड़े नियम बनाने का अनन्य अधिकार संसद के पास है।


24. [नागरिकता एवं संघ राज्य क्षेत्र] - नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत भारत की नागरिकता पांच तरीकों से प्राप्त की जा सकती है।

   व्याख्या: ये पांच तरीके हैं: 1. जन्म द्वारा (By Birth), 2. वंशानुगत (By Descent), 3. पंजीकरण द्वारा (By Registration), 4. प्राकृतिक रूप से (By Naturalisation), और 5. नए भूभाग के भारत में शामिल होने पर (By Incorporation of Territory)। नागरिकता की समाप्ति तीन तरीकों (परित्याग, बर्खास्ती और वंचना) से हो सकती है।


25. [नागरिकता एवं संघ राज्य क्षेत्र] - संसद ने नागरिकता कानून में संशोधन करने की अपनी शक्ति का प्रयोग करते हुए अनुच्छेद 11 के तहत कई नागरिकता संशोधन कानून बनाए हैं।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 11

   व्याख्या: नागरिकता कानून में पहली बार बड़ा संशोधन 1986 में हुआ, उसके बाद 1992, 2003, 2005, 2015 और हाल ही में 2019 में (CAA) संशोधन किया गया। 2019 के संशोधन के तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए गैर-मुस्लिम प्रवासियों को नागरिकता देने के नियमों को उदार बनाया गया है।


26. [मौलिक अधिकार] - संविधान के भाग 3 (अनुच्छेद 12 से 35) को भारत का 'अधिकार पत्र' या 'मैग्नाकार्टा' (Magna Carta) कहा जाता है।

   संबद्ध अनुच्छेद: भाग 3

   व्याख्या: मैग्नाकार्टा अधिकारों का वह ऐतिहासिक दस्तावेज है जिसे 1215 में इंग्लैंड के राजा किंग जॉन ने सामंतों के दबाव में जारी किया था। हमारे मूल अधिकार न्यायोचित (Justiciable) हैं, जिसका अर्थ है कि इनके उल्लंघन पर सीधे सुप्रीम कोर्ट (अनुच्छेद 32) या हाई कोर्ट (अनुच्छेद 226) जाया जा सकता है।


27. [मौलिक अधिकार] - मूल संविधान में सात मौलिक अधिकार थे, परंतु वर्तमान में केवल छह मौलिक अधिकार ही शेष हैं।

   व्याख्या: 44वें संविधान संशोधन अधिनियम (1978) द्वारा 'संपत्ति के अधिकार' (अनुच्छेद 31) को मौलिक अधिकारों की सूची से हटा दिया गया। अब इसे संविधान के भाग 12 के अनुच्छेद 300A (300क) के तहत एक सामान्य विधिक या कानूनी अधिकार (Legal Right) बना दिया गया है।


28. [मौलिक अधिकार] - अनुच्छेद 14 भारत के राज्यक्षेत्र में प्रत्येक व्यक्ति को 'विधि के समक्ष समता' और 'विधियों के समान संरक्षण' की गारंटी देता है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 14

   व्याख्या: विधि के समक्ष समता (Equality before Law) ब्रिटिश मूल की एक नकारात्मक अवधारणा है जिसका अर्थ है किसी को विशेषाधिकार नहीं। विधियों का समान संरक्षण (Equal Protection of Laws) अमेरिकी मूल की एक सकारात्मक अवधारणा है जिसका अर्थ है समान परिस्थितियों में कानून का समान व्यवहार।


29. [मौलिक अधिकार] - अनुच्छेद 15 धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर राज्य द्वारा किए जाने वाले किसी भी भेदभाव का निषेध करता है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 15

   व्याख्या: यह केवल नागरिकों को प्राप्त है और सार्वजनिक स्थानों जैसे दुकानों, होटलों, कुओं, तालाबों और सड़कों के उपयोग में किसी भी नागरिक के साथ भेदभाव को रोकता है। हालांकि, महिलाओं, बच्चों, सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (OBC, SC, ST) के लिए विशेष प्रावधान बनाने की छूट राज्य को है।


30. [मौलिक अधिकार] - अनुच्छेद 16 लोक नियोजन (सरकारी नौकरियों) के विषयों में सभी नागरिकों को अवसर की समानता की गारंटी देता है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 16

   व्याख्या: राज्य नौकरियों में केवल धर्म, जाति, लिंग, जन्मस्थान, वंश या निवास के आधार पर अपात्र या भेदभाव नहीं कर सकता। हालांकि, राज्य पिछड़े नागरिकों के प्रतिनिधित्व की कमी होने पर उनके लिए आरक्षण की व्यवस्था कर सकता है, जैसा कि संविधान के अनुच्छेद 16(4) में उपबंधित है।


31. [मौलिक अधिकार] - अनुच्छेद 17 द्वारा 'अस्पृश्यता का अंत' (Abolition of Untouchability) किया गया है और इसका किसी भी रूप में आचरण दंडनीय अपराध है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 17

   व्याख्या: संविधान में 'अस्पृश्यता' शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है, लेकिन कोर्ट के अनुसार इसका अर्थ ऐतिहासिक रूप से कुछ जातियों के प्रति सामाजिक रूप से थोपी गई दिव्यांगता और भेदभाव है। संसद ने इसे प्रभावी बनाने के लिए अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम, 1955 पारित किया था, जिसका नाम अब नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम है।


32. [मौलिक अधिकार] - अनुच्छेद 18 सेना और शिक्षा संबंधी सम्मानों को छोड़कर राज्य द्वारा सभी प्रकार की 'उपाधियों का अंत' करता है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 18

   व्याख्या: इसका उद्देश्य समाज में कृत्रिम अभिजात वर्ग के निर्माण को रोकना है। भारत का कोई नागरिक किसी विदेशी राज्य से कोई उपाधि स्वीकार नहीं कर सकता। 1954 में शुरू किए गए राष्ट्रीय पुरस्कारों (जैसे भारत रत्न, पद्म विभूषण) को सुप्रीम कोर्ट ने वैध माना है बशर्ते उनका नाम के आगे या पीछे उपसर्ग/प्रत्यय के रूप में प्रयोग न हो।


33. [मौलिक अधिकार] - अनुच्छेद 19(1) के तहत नागरिकों को वर्तमान में छह प्रकार की लोकतांत्रिक स्वतंत्रताएं प्राप्त हैं।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 19

   व्याख्या: इनमें शामिल हैं: (a) वाक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, (b) शांतिपूर्ण निरायुध सम्मेलन, (c) संघ या सहकारी समितियां बनाने की स्वतंत्रता, (d) निर्बाध संचरण, (e) निवास करने और बसने की स्वतंत्रता, और (g) व्यापार, व्यवसाय या पेशा अपनाने की स्वतंत्रता। इन स्वतंत्रताओं पर तार्किक प्रतिबंध (Reasonable Restrictions) लगाए जा सकते हैं।


34. [मौलिक अधिकार] - सूचना का अधिकार (RTI) और प्रेस की स्वतंत्रता को अनुच्छेद 19(1)(a) के अंतर्गत ही मौलिक अधिकार माना गया है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 19(1)(a)

   व्याख्या: सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न ऐतिहासिक निर्णयों में स्पष्ट किया है कि विचारों को व्यक्त करने की स्वतंत्रता में सूचना प्राप्त करने का अधिकार, चुप रहने का अधिकार और प्रेस के माध्यम से जनहित के मुद्दों को प्रकाशित करने का अधिकार अंतर्निहित है। राष्ट्रीय ध्वज फहराना भी इसी अनुच्छेद के तहत अभिव्यक्ति है।


35. [मौलिक अधिकार] - अनुच्छेद 20 अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में तीन प्रकार के संरक्षण प्रदान करता है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 20

   व्याख्या: संरक्षण इस प्रकार हैं: 1. कार्योत्तर विधियों से संरक्षण (Ex-Post Facto Law) अर्थात् कोई पूर्वव्यापी आपराधिक कानून नहीं बनेगा, 2. दोहरे दंड से मुक्ति (Double Jeopardy) अर्थात् एक अपराध के लिए एक से अधिक बार मुकदमा या सजा नहीं, और 3. आत्म-अभिशंसन से संरक्षण (Self-Incrimination) अर्थात् स्वयं के खिलाफ गवाही देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।


36. [मौलिक अधिकार] - अनुच्छेद 21 किसी भी व्यक्ति को उसके 'प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता' (Life and Personal Liberty) से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के बिना वंचित करने से रोकता है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 21

   व्याख्या: यह संविधान का सबसे व्यापक अनुच्छेद है। सुप्रीम कोर्ट ने मेनका गांधी मामले (1978) के बाद इसका विस्तार करते हुए इसमें गोपनीयता का अधिकार (Right to Privacy), स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार, आजीविका का अधिकार, त्वरित सुनवाई का अधिकार और गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार को शामिल माना है।


37. [मौलिक अधिकार] - 86वें संविधान संशोधन अधिनियम (2002) द्वारा अनुच्छेद 21A जोड़कर 'शिक्षा के अधिकार' को मूल अधिकार बनाया गया।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 21A

   व्याख्या: इसके तहत राज्य 6 से 14 वर्ष तक की आयु के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने के लिए बाध्य है। इस संशोधन को लागू करने हेतु संसद ने वर्ष 2009 में बच्चों का निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम पारित किया जो 1 अप्रैल 2010 से प्रभावी हुआ।


38. [मौलिक अधिकार] - अनुच्छेद 22 कुछ दशाओं में गिरफ्तारी और निरोध (Arrest and Detention) से संरक्षण प्रदान करता है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 22

   व्याख्या: इसके तहत गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर (यात्रा के समय को छोड़कर) निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करना अनिवार्य है। उसे अपनी पसंद के वकील से परामर्श करने और बचाव करने का अधिकार है। हालांकि, यह संरक्षण शत्रु देश के नागरिकों और निवारक निरोध (Preventive Detention) के तहत पकड़े गए लोगों पर लागू नहीं होता।


39. [मौलिक अधिकार] - अनुच्छेद 23 मानव दुर्व्यापार (Human Trafficking), बेगार और सभी प्रकार के 'बलात् श्रम' (Forced Labour) को प्रतिबंधित करता है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 23

   व्याख्या: यह अधिकार नागरिकों और गैर-नागरिकों दोनों को प्राप्त है और यह केवल राज्य के विरुद्ध ही नहीं बल्कि निजी व्यक्तियों के विरुद्ध भी संरक्षण प्रदान करता है। संसद ने इसे लागू करने के लिए अनैतिक दुर्व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 और बंधुआ श्रम प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम, 1976 बनाए हैं।


40. [मौलिक अधिकार] - अनुच्छेद 24 के अनुसार 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को कारखानों, खानों या अन्य संकटमय रोजगारों (Hazardous Employment) में नियोजित नहीं किया जा सकता।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 24

   व्याख्या: यह बाल श्रम के खिलाफ एक पूर्ण निषेध है। वर्ष 2016 में संसद ने बाल श्रम कानून में संशोधन कर 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के सभी प्रकार के व्यावसायिक कार्यों में काम करने पर प्रतिबंध लगा दिया, केवल पारिवारिक व्यवसायों में स्कूल के बाद काम करने की कुछ शर्तों के साथ अनुमति दी गई है।


41. [मौलिक अधिकार] - अनुच्छेद 25 अंतःकरण की स्वतंत्रता और किसी भी धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने का अधिकार देता है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 25

   व्याख्या: यह व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है। इसी अनुच्छेद के तहत सिखों को 'कृपाण' धारण करने और लेकर चलने की अनुमति दी गई है। हालांकि, यह धार्मिक स्वतंत्रता असीमित नहीं है; राज्य लोक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य और अन्य मौलिक अधिकारों के आधार पर इस पर प्रतिबंध लगा सकता है।


42. [मौलिक अधिकार] - अनुच्छेद 29 और 30 अल्पसंख्यकों के सांस्कृतिक और शैक्षणिक अधिकारों की रक्षा करते हैं।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 29-30

   व्याख्या: अनुच्छेद 29 नागरिकों के किसी भी वर्ग को अपनी विशिष्ट भाषा, लिपि या संस्कृति को बनाए रखने का अधिकार देता है। अनुच्छेद 30 सभी धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी रुचि के शिक्षण संस्थानों की स्थापना और उनके प्रशासन करने का अधिकार प्रदान करता है।


43. [मौलिक अधिकार] - डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने अनुच्छेद 32 को 'संविधान का हृदय और आत्मा' (Heart and Soul of the Constitution) कहा था।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 32

   व्याख्या: अनुच्छेद 32 'संवैधानिक उपचारों का अधिकार' (Right to Constitutional Remedies) प्रदान करता है। इसके तहत नागरिकों के मूल अधिकारों की रक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट को पांच प्रकार के रिट (Writs) - बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण और अधिकार-पृच्छा जारी करने की असाधारण शक्ति दी गई है।


44. [मौलिक अधिकार] - केवल भारतीय नागरिकों को प्राप्त मौलिक अधिकार अनुच्छेद 15, 16, 19, 29 और 30 हैं।

   व्याख्या: ये पांच विशेष मौलिक अधिकार विदेशियों को प्राप्त नहीं हैं। शेष सभी मौलिक अधिकार (जैसे अनुच्छेद 14, 20, 21, 21A, 22, 23, 24, 25, 26, 27 और 28) भारत की भूमि पर रहने वाले सभी व्यक्तियों (चाहे वे नागरिक हों या विदेशी शत्रु देश के नागरिकों को छोड़कर) को समान रूप से प्राप्त हैं।


45. [मौलिक अधिकार] - राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352) के दौरान भी अनुच्छेद 20 और 21 के तहत प्राप्त मौलिक अधिकारों को निलंबित नहीं किया जा सकता।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 359

   व्याख्या: 44वें संविधान संशोधन (1978) द्वारा यह व्यवस्था की गई कि राष्ट्रपति आपातकाल में भी अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण (अनुच्छेद 20) और जीवन व व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार (अनुच्छेद 21) को स्थगित नहीं कर सकते। अनुच्छेद 19 के अधिकार केवल बाहरी आक्रमण या युद्ध के आधार पर ही स्वतः निलंबित होते हैं।


46. [राज्य के नीति निदेशक तत्व] - राज्य के नीति निदेशक तत्व (DPSP) संविधान के भाग 4 (अनुच्छेद 36 से 51) में वर्णित हैं और इन्हें आयरलैंड के संविधान से लिया गया है।

   संबद्ध अनुच्छेद: भाग 4

   व्याख्या: आयरलैंड ने स्वयं इन्हें 1937 में स्पेन के संविधान से लिया था। नीति निदेशक तत्व देश के शासन के लिए मूलभूत सिद्धांत हैं जिनका उद्देश्य भारत में एक 'कल्याणकारी राज्य' (Welfare State) की स्थापना करना और सामाजिक-आर्थिक लोकतंत्र को सुदृढ़ बनाना है।


47. [राज्य के नीति निदेशक तत्व] - नीति निदेशक तत्व गैर-न्यायोचित (Non-Justiciable) हैं, अर्थात् इनके उल्लंघन पर अदालत नहीं जाया जा सकता।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 37

   व्याख्या: अनुच्छेद 37 स्पष्ट करता है कि निदेशक तत्व न्यायपालिका द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हैं, लेकिन फिर भी ये देश के शासन में मूलभूत हैं और कानून बनाते समय इन सिद्धांतों को लागू करना राज्य का कर्तव्य होगा। वित्तीय सीमाओं के कारण संविधान सभा ने इन्हें न्यायोचित नहीं बनाया था।


48. [राज्य के नीति निदेशक तत्व] - अनुच्छेद 39A (39क) के तहत राज्य सभी गरीबों को 'समान न्याय और मुफ्त कानूनी सहायता' (Free Legal Aid) प्रदान करेगा।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 39A

   व्याख्या: इसे 42वें संविधान संशोधन (1976) द्वारा जोड़ा गया था। इस संवैधानिक जनादेश को पूरा करने के लिए सरकार ने 1987 में विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम पारित किया, जिसके तहत राष्ट्रीय स्तर पर नालसा (NALSA) और राज्य स्तर पर साल्सा (SALSA) का गठन लोक अदालतों और मुफ्त कानूनी सहायता हेतु किया गया।


49. [राज्य के नीति निदेशक तत्व] - अनुच्छेद 40 राज्य को 'ग्राम पंचायतों के संगठन' का निर्देश देता है, जो गांधीवादी दर्शन पर आधारित है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 40

   व्याख्या: राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ग्राम स्वराज्य और स्थानीय स्वशासन के प्रबल समर्थक थे। वे चाहते थे कि भारत की आत्मा गांवों में बसे और वे आत्मनिर्भर बनें। हालांकि इसे मूल रूप से केवल एक नीति निदेशक तत्व के रूप में रखा गया था, जिसे बाद में 73वें संशोधन द्वारा संवैधानिक दर्जा दिया गया।


50. [राज्य के नीति निदेशक तत्व] - अनुच्छेद 44 भारत के पूरे क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक 'समान नागरिक संहिता' (Uniform Civil Code) सुनिश्चित करने का निर्देश देता है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 44

   व्याख्या: UCC का अर्थ है सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, विरासत और गोद लेने जैसे व्यक्तिगत मामलों में धर्म से परे एक समान कानून होना। वर्तमान में गोवा एकमात्र ऐसा भारतीय राज्य है जहां पुर्तगाली काल से ही समान नागरिक संहिता लागू है, और हाल ही में उत्तराखंड विधानसभा ने इसे लागू करने हेतु विधेयक पारित किया है।


51. [राज्य के नीति निदेशक तत्व] - अनुच्छेद 45 मूलतः 6 वर्ष से कम आयु के बच्चों की शुरुआती देखरेख और शिक्षा (ECCE) प्रदान करने से संबंधित है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 45

   व्याख्या: मूल संविधान में इसमें 14 वर्ष तक की आयु के बच्चों के लिए शिक्षा की बात थी, लेकिन 86वें संशोधन (2002) द्वारा जब शिक्षा को अनुच्छेद 21A के तहत मौलिक अधिकार बनाया गया, तब अनुच्छेद 45 की भाषा बदलकर इसे '6 वर्ष से कम उम्र के शिशुओं की देखरेख और पूर्व-प्राथमिक शिक्षा' तक सीमित कर दिया गया।


52. [राज्य के नीति निदेशक तत्व] - अनुच्छेद 48A (48क) राज्य को पर्यावरण के संरक्षण, संवर्धन और वन्यजीवों की रक्षा का निर्देश देता है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 48A

   व्याख्या: इसे 42वें संविधान संशोधन अधिनियम (1976) द्वारा जोड़ा गया था। इसी अनुच्छेद के तहत देश में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 और वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 जैसे महत्वपूर्ण पर्यावरण संरक्षण कानून बनाए गए हैं ताकि पारिस्थितिकी संतुलन बना रहे।


53. [राज्य के नीति निदेशक तत्व] - अनुच्छेद 50 कार्यपालिका से न्यायपालिका के पृथक्करण (Separation of Judiciary from Executive) का प्रावधान करता है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 50

   व्याख्या: लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में न्यायपालिका का स्वतंत्र और निष्पक्ष होना अनिवार्य है। कार्यपालिका के हस्तक्षेप को रोकने और निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित करने के लिए आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) द्वारा न्यायिक मजिस्ट्रेटों को प्रशासनिक अधिकारियों (जैसे DM, SDM) से पृथक कर स्वतंत्र कर दिया गया है।


54. [राज्य के नीति निदेशक तत्व] - अनुच्छेद 51 अंतरराष्ट्रीय शांति, सुरक्षा के संवर्धन और राष्ट्रों के बीच न्यायपूर्ण संबंधों को बनाए रखने का निर्देश देता है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 51

   व्याख्या: यह अनुच्छेद भारत की विदेश नीति के मूल आदर्शों को प्रदर्शित करता है। भारत इसी अनुच्छेद के तहत संयुक्त राष्ट्र (UN) के चार्टर और अंतरराष्ट्रीय संधियों का सम्मान करता है। गुटनिरपेक्ष आंदोलन और 'पंचशील का सिद्धांत' भी इसी अनुच्छेद के दार्शनिक आधार से प्रेरित थे।


55. [मौलिक कर्तव्य] - मूल संविधान में मौलिक कर्तव्यों का कोई उल्लेख नहीं था; इन्हें स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिश पर जोड़ा गया।

   संबद्ध अनुच्छेद: भाग 4A

   व्याख्या: आपातकाल के दौरान नागरिक कर्तव्यों के महत्व को महसूस करते हुए सरकार ने 1976 में सरदार स्वर्ण सिंह समिति का गठन किया था। समिति की सिफारिश पर 42वें संविधान संशोधन (1976) द्वारा संविधान में एक नया भाग 4A (4क) और केवल एक अनुच्छेद 51A (51क) जोड़कर 10 मूल कर्तव्य शामिल किए गए।


56. [मौलिक कर्तव्य] - मौलिक कर्तव्यों को पूर्व सोवियत संघ (USSR) के संविधान से लिया गया है।

   व्याख्या: प्रमुख लोकतांत्रिक देशों (जैसे अमेरिका, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया) के मूल संविधानों में नागरिक कर्तव्यों की सूची नहीं है, केवल जापान के संविधान में इसका उल्लेख मिलता है। भारतीय विचारकों के अनुसार ये कर्तव्य प्राचीन भारतीय संस्कृति और जीवन शैली में पहले से ही अंतर्निहित थे।


57. [मौलिक कर्तव्य] - वर्तमान में भारतीय नागरिकों के लिए कुल 11 मौलिक कर्तव्य निर्धारित हैं।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 51A

   व्याख्या: शुरुआत में केवल 10 कर्तव्य जोड़े गए थे। इसके बाद 86वें संविधान संशोधन अधिनियम (2002) द्वारा 11वां मौलिक कर्तव्य जोड़ा गया। इसके तहत यह प्रत्येक माता-पिता या अभिभावक का कर्तव्य है कि वे अपने 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को शिक्षा के अवसर प्रदान करें।


58. [मौलिक कर्तव्य] - मौलिक कर्तव्य केवल भारतीय नागरिकों के लिए हैं, विदेशियों के लिए नहीं, और ये अदालत द्वारा सीधे लागू नहीं किए जा सकते।

   व्याख्या: नीति निदेशक तत्वों की तरह मूल कर्तव्य भी गैर-न्यायोचित हैं। इनके उल्लंघन पर संविधान में सीधे किसी दंड का प्रावधान नहीं है, परंतु संसद कानून बनाकर (जैसे राष्ट्रगौरव अपमान निवारण अधिनियम, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, या जनप्रतिनिधित्व कानून) इनके उल्लंघन पर सजा की व्यवस्था कर सकती है।


59. [संघीय कार्यपालिका (राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति)] - अनुच्छेद 52 के अनुसार 'भारत का एक राष्ट्रपति होगा', जो राज्य का प्रमुख (Head of State) और देश का प्रथम नागरिक होता है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 52

   व्याख्या: वह भारत की एकता, अखंडता और सुदृढ़ता का प्रतीक है। संघ की संपूर्ण कार्यपालिका शक्ति (Executive Power) अनुच्छेद 53 के तहत राष्ट्रपति में निहित होती है, जिसका प्रयोग वह स्वयं या अपने अधीनस्थ अधिकारियों के माध्यम से करता है। वह तीनों सेनाओं का सर्वोच्च सेनापति भी होता है।


60. [संघीय कार्यपालिका (राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति)] - राष्ट्रपति का निर्वाचन एक निर्वाचक मंडल (Electoral College) द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार होता है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 54

   व्याख्या: अनुच्छेद 54 के अनुसार निर्वाचक मंडल में संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्य (लोकसभा व राज्यसभा के मनोनीत सदस्य नहीं) और सभी राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य शामिल होते हैं। 70वें संशोधन द्वारा दिल्ली और पुदुच्चेरी विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों को भी इसमें शामिल किया गया है।


61. [संघीय कार्यपालिका (राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति)] - अनुच्छेद 61 राष्ट्रपति पर महाभियोग (Impeachment) चलाने की विशिष्ट प्रक्रिया का वर्णन करता है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 61

   व्याख्या: राष्ट्रपति को केवल 'संविधान के अतिक्रमण' (Violation of the Constitution) के आधार पर ही पद से हटाया जा सकता है। महाभियोग का प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में शुरू किया जा सकता है, बशर्ते 14 दिन पूर्व लिखित सूचना दी गई हो और प्रस्ताव उस सदन की कुल सदस्य संख्या के दो-तिहाई बहुमत से पारित हो।


62. [संघीय कार्यपालिका (राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति)] - अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति को किसी भी अपराधी की सजा को क्षमा करने, कम करने या स्थगित करने की शक्ति प्राप्त है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 72

   व्याख्या: राष्ट्रपति की न्यायिक शक्तियों के अंतर्गत वह मृत्युदंड (Death Sentence) को पूरी तरह क्षमा कर सकता है और सैन्य अदालतों (Court Martial) द्वारा दी गई सजा को भी बदल सकता है (यह शक्ति राज्यपालों को प्राप्त नहीं है)। राष्ट्रपति दया याचिका पर गृह मंत्रालय की सलाह के अनुसार कार्य करता है।


63. [संघीय कार्यपालिका (राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति)] - संसद के सत्र न चल रहे होने पर राष्ट्रपति अनुच्छेद 123 के तहत अध्यादेश (Ordinance) जारी कर सकता है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 123

   व्याख्या: अध्यादेश की शक्ति और प्रभाव संसद द्वारा पारित अधिनियम के समान ही होता है। यह एक अस्थायी कानून है जो संसद के पुनः सत्र शुरू होने के 6 सप्ताह के भीतर दोनों सदनों द्वारा स्वीकृत न होने पर समाप्त हो जाता है। एक अध्यादेश की अधिकतम अवधि 6 माह और 6 सप्ताह हो सकती है।


64. [संघीय कार्यपालिका (राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति)] - अनुच्छेद 143 राष्ट्रपति को सुप्रीम कोर्ट से कानूनी मामलों में परामर्श (Advisory Opinion) लेने का अधिकार देता है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 143

   व्याख्या: राष्ट्रपति किसी सार्वजनिक महत्व के कानूनी तथ्य या पूर्व-संवैधानिक संधि के मामले में सुप्रीम कोर्ट की राय मांग सकता है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट राय देने के लिए बाध्य नहीं है (पूर्व-संवैधानिक मामलों को छोड़कर), और न ही राष्ट्रपति सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई राय को मानने के लिए कानूनी रूप से बाध्य है।


65. [संघीय कार्यपालिका (राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति)] - अनुच्छेद 63 के अनुसार 'भारत का एक उपराष्ट्रपति होगा', जिसका पद अमेरिकी संविधान से प्रेरित है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 63

   व्याख्या: उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति (Ex-Officio Chairman) होता है (अनुच्छेद 64)। वह अपने पद का कोई वेतन नहीं पाता, बल्कि राज्यसभा के सभापति के रूप में कार्य करने का वेतन प्राप्त करता है। राष्ट्रपति के अनुपस्थित होने पर वह अधिकतम 6 माह तक कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्य कर सकता है।


66. [संघीय कार्यपालिका (राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति)] - उपराष्ट्रपति के चुनाव में संसद के सभी सदस्य (निर्वाचित और मनोनीत दोनों) भाग लेते हैं।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 66

   व्याख्या: राष्ट्रपति चुनाव के विपरीत, उपराष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल में राज्यों की विधानसभाओं के सदस्य शामिल नहीं होते हैं। लेकिन संसद के मनोनीत सदस्य (जैसे राज्यसभा में राष्ट्रपति द्वारा नामांकित 12 सदस्य) उपराष्ट्रपति के चुनाव में मतदान कर सकते हैं।


67. [संसद (लोकसभा व राज्यसभा)] - अनुच्छेद 79 के अनुसार भारत की संसद राष्ट्रपति, लोकसभा और राज्यसभा से मिलकर बनती है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 79

   व्याख्या: राष्ट्रपति संसद के किसी भी सदन का सदस्य नहीं होता है और न ही वह संसद में बैठता है, लेकिन वह संसद का एक अभिन्न अंग है क्योंकि संसद द्वारा पारित कोई भी विधेयक तब तक कानून नहीं बन सकता जब तक कि उस पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर न हो जाएं।


68. [संसद (लोकसभा व राज्यसभा)] - राज्यसभा (अनुच्छेद 80) संसद का उच्च सदन है जो एक 'स्थायी सदन' (Permanent House) है और कभी भंग नहीं होता।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 80

   व्याख्या: राज्यसभा के सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष होता है। इसके एक-तिहाई (1/3) सदस्य प्रत्येक दो वर्ष की समाप्ति पर सेवानिवृत्त हो जाते हैं और उनके स्थान पर नए सदस्यों का चुनाव होता है। राज्यसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 250 निर्धारित है, जिसमें से 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा कला, साहित्य, विज्ञान और समाज सेवा से मनोनीत किए जाते हैं।


69. [संसद (लोकसभा व राज्यसभा)] - लोकसभा (अनुच्छेद 81) संसद का निम्न सदन या लोकप्रिय सदन है, जिसका सामान्य कार्यकाल 5 वर्ष होता है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 81

   व्याख्या: यह जनता का प्रतिनिधित्व करता है और इसके सदस्यों का चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर प्रत्यक्ष मतदान द्वारा होता है। राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह पर लोकसभा को उसका कार्यकाल पूरा होने से पहले भी भंग कर सकता है। लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 550 हो सकती है (104वें संशोधन द्वारा एंग्लो-इंडियन मनोनयन समाप्त कर दिया गया है)।


70. [संसद (लोकसभा व राज्यसभा)] - अनुच्छेद 108 के अनुसार दोनों सदनों में गतिरोध होने पर राष्ट्रपति 'संसद की संयुक्त बैठक' (Joint Sitting) बुला सकता है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 108

   व्याख्या: संयुक्त बैठक की अध्यक्षता हमेशा लोकसभा का अध्यक्ष (Speaker) करता है, उसकी अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष या राज्यसभा का उपसभापति करता है (राज्यसभा का सभापति कभी इसकी अध्यक्षता नहीं करता)। संयुक्त बैठक में निर्णय साधारण बहुमत से लिया जाता है। धन विधेयक और संविधान संशोधन विधेयक पर संयुक्त बैठक नहीं बुलाई जा सकती।


71. [संसद (लोकसभा व राज्यसभा)] - अनुच्छेद 110 में 'धन विधेयक' (Money Bill) की परिभाषा दी गई है, जिस पर लोकसभा का पूर्ण नियंत्रण होता है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 110

   व्याख्या: कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं, इसका निर्णय केवल लोकसभा अध्यक्ष करता है और उसका निर्णय अंतिम होता है। धन विधेयक केवल राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश पर लोकसभा में ही पेश किया जा सकता है। राज्यसभा इसे अधिकतम केवल 14 दिनों तक रोक सकती है; यदि वह इस दौरान इसे पारित नहीं करती, तो इसे स्वतः पारित मान लिया जाता है।


72. [संसद (लोकसभा व राज्यसभा)] - अनुच्छेद 112 वार्षिक वित्तीय विवरण जिसे सामान्यतः 'बजट' (Budget) कहा जाता है, को संसद में पेश करने का उपबंध करता है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 112

   व्याख्या: संविधान में 'बजट' शब्द का उल्लेख नहीं है; इसके स्थान पर 'वार्षिक वित्तीय विवरण' (Annual Financial Statement) शब्द प्रयुक्त हुआ है। राष्ट्रपति प्रत्येक वित्तीय वर्ष के संबंध में सरकार के अनुमानित प्राप्तियों और खर्चों का विवरण संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखवाता है।


73. [संसद (लोकसभा व राज्यसभा)] - राज्यसभा को अनुच्छेद 249 और 312 के तहत दो अत्यंत विशिष्ट अनन्य शक्तियां प्राप्त हैं जो लोकसभा के पास नहीं हैं।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 249, 312

   व्याख्या: अनुच्छेद 249 के तहत राज्यसभा राज्य सूची के किसी विषय को 'राष्ट्रीय महत्व का' घोषित कर सकती है, जिससे संसद को उस पर कानून बनाने का अधिकार मिल जाता है। अनुच्छेद 312 के तहत राज्यसभा विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित कर नई 'अखिल भारतीय सेवाओं' (All India Services) के सृजन की सिफारिश कर सकती है।


74. [संसद (लोकसभा व राज्यसभा)] - संसद के दो सत्रों के बीच अधिकतम अंतराल 6 महीने से अधिक नहीं हो सकता।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 85

   व्याख्या: संविधान के अनुसार राष्ट्रपति वर्ष में कम से कम दो बार संसद के सत्र बुलाने के लिए बाध्य है। सामान्यतः भारत में संसद के तीन सत्र आयोजित किए जाते हैं: 1. बजट सत्र (फरवरी-मई, सबसे लंबा), 2. मानसून सत्र (जुलाई-सितंबर) और 3. शीतकालीन सत्र (नवंबर-दिसंबर, सबसे छोटा)।


75. [राज्य कार्यपालिका व विधानमंडल] - अनुच्छेद 153 के अनुसार प्रत्येक राज्य का एक राज्यपाल (Governor) होगा, जो केंद्र के प्रतिनिधि के रूप में भी कार्य करता है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 153

   व्याख्या: राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और वह राष्ट्रपति के 'प्रसादपर्यंत' (During the Pleasure of the President) अपना पद धारण करता है (अनुच्छेद 156)। एक ही व्यक्ति को दो या दो से अधिक राज्यों का राज्यपाल भी नियुक्त किया जा सकता है। वह राज्य का औपचारिक कार्यकारी प्रमुख होता है।


76. [राज्य कार्यपालिका व विधानमंडल] - राज्यपाल को अनुच्छेद 161 के तहत राज्य सूची के विषयों से संबंधित अपराधों में क्षमादान की शक्ति प्राप्त है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 161

   व्याख्या: राज्यपाल सजा को क्षमा, कम या स्थगित कर सकता है, परंतु वह राष्ट्रपति के विपरीत 'मृत्युदंड' (Death Sentence) को पूरी तरह क्षमा नहीं कर सकता और न ही उसे सैन्य अदालतों द्वारा दी गई सजा को बदलने की कोई शक्ति प्राप्त है। वह केवल मृत्युदंड को स्थगित या बदल सकता है।


77. [राज्य कार्यपालिका व विधानमंडल] - अनुच्छेद 213 के तहत राज्यपाल को राज्य विधानमंडल के सत्र में न होने पर 'अध्यादेश' जारी करने की शक्ति प्राप्त है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 213

   व्याख्या: राज्यपाल द्वारा जारी अध्यादेश की शक्ति भी राज्य विधानमंडल द्वारा पारित कानून के समान ही होती है। इसे विधानमंडल का सत्र शुरू होने के 6 सप्ताह के भीतर स्वीकृत होना अनिवार्य है, अन्यथा यह प्रभावहीन हो जाता है। यह राष्ट्रपति की अनुच्छेद 123 की शक्ति के समरूप है।


78. [राज्य कार्यपालिका व विधानमंडल] - अनुच्छेद 169 संसद को किसी राज्य में 'विधान परिषद' (Legislative Council) के सृजन या समाप्ति का अधिकार देता है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 169

   व्याख्या: इसके लिए संबंधित राज्य की विधानसभा को अपनी कुल सदस्य संख्या के बहुमत तथा उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित करना होता है, जिसके बाद संसद साधारण कानून द्वारा विधान परिषद का गठन या विघटन कर सकती है। वर्तमान में भारत के केवल 6 राज्यों (UP, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना) में द्विसदनीय व्यवस्था है।


79. [राज्य कार्यपालिका व विधानमंडल] - विधानसभा (अनुच्छेद 170) के सदस्यों की न्यूनतम संख्या 60 और अधिकतम संख्या 500 निर्धारित की गई है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 170

   व्याख्या: सदस्यों का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा किया जाता है। हालांकि, कुछ छोटे राज्यों जैसे सिक्किम (32), मिजोरम (40), गोवा (40) और पुदुच्चेरी (30) को इस नियम का अपवाद बनाया गया है। विधानसभा का सामान्य कार्यकाल भी लोकसभा की तरह 5 वर्ष का होता है।


80. [न्यायपालिका (SC और HC)] - अनुच्छेद 124 के तहत भारत के 'उच्चतम न्यायालय' (Supreme Court) के गठन, शक्तियों और न्यायाधीशों की नियुक्ति का प्रावधान है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 124

   व्याख्या: सुप्रीम कोर्ट का उद्घाटन 28 जनवरी 1950 को हुआ था। वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश (CJI) सहित कुल 34 न्यायाधीश हैं। न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा एक विशिष्ट 'कॉलोजियम प्रणाली' (Collegium System) की सिफारिश पर की जाती है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश 65 वर्ष की आयु तक पद पर बने रहते हैं।


81. [न्यायपालिका (SC और HC)] - अनुच्छेद 129 सुप्रीम कोर्ट को एक 'अभिलेख न्यायालय' (Court of Record) घोषित करता है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 129

   व्याख्या: इसका तात्पर्य यह है कि सुप्रीम कोर्ट के सभी फैसले, कार्यवाही और निर्णय स्थायी स्मृति और गवाही के रूप में सुरक्षित रखे जाएंगे और देश के किसी भी अधीनस्थ न्यायालय में उन्हें कानून की तरह उद्धृत किया जा सकता है। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट को अपनी 'अवमानना' (Contempt of Court) के लिए दंड देने की भी शक्ति है।


82. [न्यायपालिका (SC और HC)] - अनुच्छेद 131 सुप्रीम कोर्ट के 'मूल क्षेत्राधिकार' (Original Jurisdiction) को परिभाषित करता है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 131

   व्याख्या: मूल क्षेत्राधिकार का अर्थ है वे मामले जो सीधे केवल सुप्रीम कोर्ट में ही शुरू किए जा सकते हैं, जैसे: केंद्र और एक या अधिक राज्यों के बीच विवाद, या दो या अधिक राज्यों के बीच पारस्परिक विवाद। संसद के चुनाव संबंधी या सामान्य दीवानी विवाद इसके अंतर्गत नहीं आते।


83. [न्यायपालिका (SC और HC)] - अनुच्छेद 137 सुप्रीम कोर्ट को अपने स्वयं के निर्णयों या आदेशों के 'पुनरावलोकन' (Review of Judgments) की शक्ति देता है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 137

   व्याख्या: यह शक्ति सुप्रीम कोर्ट को अपनी पूर्व में की गई गलतियों को सुधारने का अवसर देती है। उदाहरण के लिए, सुप्रीम कोर्ट ने गोलकनाथ मामले (1967) के फैसले को बदलते हुए केशवानंद भारती मामले (1973) में नया ऐतिहासिक सिद्धांत प्रतिपादित किया था। न्यायपालिका अपने पिछले निर्णयों से पूरी तरह बंधी नहीं है।


84. [न्यायपालिका (SC और HC)] - अनुच्छेद 214 के अनुसार प्रत्येक राज्य के लिए एक 'उच्च न्यायालय' (High Court) का प्रावधान किया गया है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 214

   व्याख्या: हालांकि, संसद अनुच्छेद 231 के तहत दो या दो से अधिक राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों के लिए एक ही 'साझा उच्च न्यायालय' (Common High Court) स्थापित कर सकती है। वर्तमान में भारत में कुल 25 उच्च न्यायालय कार्यरत हैं। कोलकाता उच्च न्यायालय भारत का सबसे पुराना (1862) और प्रयागराज उच्च न्यायालय एशिया का सबसे बड़ा न्यायालय है।


85. [न्यायपालिका (SC और HC)] - अनुच्छेद 226 हाई कोर्ट को मौलिक अधिकारों और अन्य विधिक अधिकारों को लागू करने के लिए रिट जारी करने की शक्ति देता है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 226

   व्याख्या: यह ध्यान देने योग्य तथ्य है कि रिट जारी करने के मामले में हाई कोर्ट का क्षेत्राधिकार सुप्रीम कोर्ट (अनुच्छेद 32) से भी अधिक व्यापक है। सुप्रीम कोर्ट केवल मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर रिट जारी कर सकता है, जबकि हाई कोर्ट मौलिक अधिकारों के साथ-साथ किसी भी अन्य कानूनी अधिकार के उल्लंघन पर भी रिट जारी कर सकता है।


86. [न्यायपालिका (SC और HC)] - भारत में जनहित याचिका (PIL - Public Interest Litigation) का जनक जस्टिस पी.एन. भगवती को माना जाता है।

   व्याख्या: PIL की शुरुआत 1980 के दशक में हुई थी। यह पारंपरिक न्यायिक प्रक्रिया के नियम 'लोकस स्टैंडाई' (Locus Standi - पीड़ित व्यक्ति ही कोर्ट जा सकता है) को शिथिल करता है। इसके तहत कोई भी संवेदनशील नागरिक या संगठन समाज के कमजोर और शोषित वर्गों के अधिकारों की रक्षा के लिए सीधे कोर्ट में याचिका दायर कर सकता है।


87. [पंचायती राज व स्थानीय शासन] - बलवंत राय मेहता समिति (1957) की सिफारिश पर भारत में त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था लागू की गई थी।

   व्याख्या: मेहता समिति ने विकेंद्रीकरण की सिफारिश की थी जिसमें तीन स्तर थे: ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत, ब्लॉक स्तर पर पंचायत समिति और जिला स्तर पर जिला परिषद। बलवंत राय मेहता को 'भारत में पंचायती राज व्यवस्था का वास्तुकार' (Architect of Panchayati Raj) कहा जाता है।


88. [पंचायती राज व स्थानीय शासन] - भारत में पंचायती राज की शुरुआत सर्वप्रथम 2 अक्टूबर 1959 को राजस्थान के नागौर जिले से हुई थी।

   व्याख्या: तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने नागौर के बगदरी गांव में इसका उद्घाटन किया था। इसके तुरंत बाद आंध्र प्रदेश ने भी 11 अक्टूबर 1959 को अपने राज्य में पंचायती राज व्यवस्था लागू की थी। हालांकि, शुरुआती दौर में इन निकायों को कोई संवैधानिक दर्जा या सुरक्षा प्राप्त नहीं थी।


89. [पंचायती राज व स्थानीय शासन] - 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा पंचायतों को संवैधानिक दर्जा दिया गया।

   संबद्ध अनुच्छेद: भाग 9

   व्याख्या: इस ऐतिहासिक संशोधन के माध्यम से संविधान में एक नया भाग 9 और 11वीं अनुसूची जोड़ी गई। 11वीं अनुसूची में पंचायतों के कार्य हेतु कुल 29 विषयों (जैसे कृषि, स्वास्थ्य, प्राथमिक शिक्षा आदि) की सूची दी गई है। यह कानून पूरे देश में 24 अप्रैल 1993 से लागू हुआ, इसलिए प्रत्येक वर्ष 24 अप्रैल को 'राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस' मनाया जाता है।


90. [पंचायती राज व स्थानीय शासन] - 74वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा शहरी स्थानीय निकायों (नगरपालिकाओं) को संवैधानिक दर्जा दिया गया।

   संबद्ध अनुच्छेद: भाग 9A

   व्याख्या: इस संशोधन द्वारा संविधान में भाग 9A (9क) और 12वीं अनुसूची जोड़ी गई। 12वीं अनुसूची के अंतर्गत शहरी निकायों को कार्य करने हेतु कुल 18 विषय (जैसे सड़क, पार्क, कचरा प्रबंधन, जलापूर्ति आदि) सौंपे गए हैं। यह कानून 1 जून 1993 से देश में प्रभावी हुआ।


91. [पंचायती राज व स्थानीय शासन] - पंचायतों और नगरपालिकाओं में महिलाओं के लिए सभी स्तरों पर कम से कम एक-तिहाई (33%) सीटें आरक्षित की गई हैं।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 243D

   व्याख्या: अनुच्छेद 243D (243घ) के तहत अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति की महिलाओं के साथ-साथ सामान्य वर्ग की महिलाओं के लिए भी वार्ड स्तर और अध्यक्ष के पदों पर 33% आरक्षण अनिवार्य है। कई राज्यों (जैसे बिहार, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश) ने इसे बढ़ाकर 50% कर दिया है।


92. [पंचायती राज व स्थानीय शासन] - पंचायतों के निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए अनुच्छेद 243K के तहत 'राज्य निर्वाचन आयोग' (State Election Commission) का गठन किया जाता है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 243K

   व्याख्या: राज्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति संबंधित राज्य के राज्यपाल द्वारा की जाती है और उन्हें केवल उसी कठोर प्रक्रिया से पद से हटाया जा सकता है जिससे हाई कोर्ट के न्यायाधीश को हटाया जाता है। भारत का निर्वाचन आयोग पंचायतों के चुनाव आयोजित नहीं करता, यह पूरी तरह राज्य चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है।


93. [पंचायती राज व स्थानीय शासन] - अनुच्छेद 243I के तहत राज्यपाल द्वारा प्रत्येक 5 वर्ष में एक 'राज्य वित्त आयोग' (State Finance Commission) का गठन किया जाता है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 243I

   व्याख्या: राज्य वित्त आयोग का मुख्य कार्य राज्य सरकार द्वारा एकत्रित करों, शुल्कों और राजस्व में से पंचायतों और नगरपालिकाओं को दिए जाने वाले हिस्से की सिफारिश करना तथा स्थानीय निकायों की वित्तीय स्थिति को मजबूत बनाने के उपायों का सुझाव देना है।


94. [संवैधानिक व गैर-संवैधानिक निकाय] - अनुच्छेद 324 के तहत भारत के एक 'निर्वाचन आयोग' (Election Commission) की स्थापना की गई है जो स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करता है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 324

   व्याख्या: चुनाव आयोग राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, संसद (लोकसभा, राज्यसभा) और राज्य विधानसभाओं व विधान परिषदों के चुनावों का संचालन करता है। वर्तमान में यह एक तीन सदस्यीय निकाय है जिसमें एक मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और दो चुनाव आयुक्त शामिल होते हैं।


95. [संवैधानिक व गैर-संवैधानिक निकाय] - संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और राज्य लोक सेवा आयोग (SPSC) का गठन अनुच्छेद 315 के तहत किया जाता है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 315

   व्याख्या: UPSC के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और वे 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु (जो भी पहले हो) तक पद पर बने रहते हैं। SPSC के सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल करता है लेकिन उन्हें पद से केवल राष्ट्रपति ही हटा सकते हैं, और उनकी सेवानिवृत्ति आयु 62 वर्ष होती है।


96. [संवैधानिक व गैर-संवैधानिक निकाय] - अनुच्छेद 280 के तहत राष्ट्रपति प्रत्येक पांच वर्ष में एक 'वित्त आयोग' (Finance Commission) का गठन करते हैं।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 280

   व्याख्या: यह एक अर्ध-न्यायिक संवैधानिक निकाय है। इसका मुख्य कार्य संघ और राज्यों के बीच शुद्ध कर राजस्व के वितरण और विभिन्न राज्यों के बीच इसके आबंटन (Vertical and Horizontal Devolution) के सिद्धांतों पर राष्ट्रपति को सिफारिशें देना है। पहले वित्त आयोग के अध्यक्ष के.सी. नियोगी थे।


97. [संवैधानिक व गैर-संवैधानिक निकाय] - अनुच्छेद 148 भारत के 'नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक' (CAG - Comptroller and Auditor General) के स्वतंत्र पद का सृजन करता है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 148

   व्याख्या: CAG को भारत के सार्वजनिक धन का रक्षक (Guardian of Public Purse) कहा जाता है। वह केंद्र और राज्य सरकारों के सभी खर्चों का ऑडिट करता है और अपनी रिपोर्ट क्रमशः राष्ट्रपति और संबंधित राज्यपालों को सौंपता है। संसद की लोक लेखा समिति (PAC) CAG की रिपोर्टों की जांच करती है और CAG को अपना 'मित्र, दार्शनिक और मार्गदर्शक' मानती है।


98. [संवैधानिक व गैर-संवैधानिक निकाय] - अनुच्छेद 76 के तहत 'भारत के महान्यायवादी' (Attorney General of India) के पद का प्रावधान किया गया है, जो देश का सर्वोच्च कानून अधिकारी होता है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 76

   व्याख्या: महान्यायवादी की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत कार्य करता है। उसे भारत के सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार होता है और वह संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही में भाग ले सकता है और बोल सकता है (लेकिन मतदान नहीं कर सकता)।


99. [संवैधानिक व गैर-संवैधानिक निकाय] - नीति आयोग (NITI Aayog) एक गैर-संवैधानिक और न्यायेतर (Extra-Constitutional) निकाय है, जिसका गठन 1 जनवरी 2015 को योजना आयोग के स्थान पर किया गया था।

   व्याख्या: NITI का पूर्ण रूप 'National Institution for Transforming India' है। यह भारत सरकार के मुख्य थिंक टैंक (Think Tank) के रूप में कार्य करता है जो सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) को बढ़ावा देता है। भारत का प्रधानमंत्री नीति आयोग का पदेन अध्यक्ष होता है।


100. [संवैधानिक व गैर-संवैधानिक निकाय] - राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) एक सांविधिक निकाय (Statutory Body) है जिसका गठन संसद के एक कानून द्वारा 1993 में किया गया था।

   व्याख्या: संवैधानिक निकायों के विपरीत, सांविधिक निकायों का उल्लेख संविधान के मूल पाठ में नहीं होता बल्कि इनका निर्माण संसद द्वारा पारित विशेष अधिनियमों द्वारा किया जाता है। NHRC देश में मानवाधिकारों के संरक्षण और संवर्धन के लिए प्रहरी के रूप में कार्य करता है।


101. [संविधान संशोधन एवं अनुच्छेद] - प्रथम संविधान संशोधन अधिनियम (1951) द्वारा संविधान में 'नौवीं अनुसूची' (Ninth Schedule) जोड़ी गई थी।

   संबद्ध अनुच्छेद: नौवीं अनुसूची

   व्याख्या: इस संशोधन का मुख्य उद्देश्य जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार कानूनों को अदालतों के न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) से सुरक्षा प्रदान करना था। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल में इस अनुसूची को जोड़ा गया था ताकि भूमि सुधार तेजी से लागू किए जा सकें।


102. [संविधान संशोधन एवं अनुच्छेद] - 52वें संविधान संशोधन अधिनियम (1985) द्वारा संविधान में 'दसवीं अनुसूची' जोड़कर 'दलबदल विरोधी कानून' (Anti-Defection Law) लागू किया गया।

   संबद्ध अनुच्छेद: दसवीं अनुसूची

   व्याख्या: इसका उद्देश्य राजनीतिक अस्थिरता को रोकना और अवसरवादी दलबदल पर रोक लगाना था। इसके तहत यदि कोई सांसद या विधायक स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ता है या पार्टी व्हिप का उल्लंघन करता है, तो उसे अयोग्य ठहराया जा सकता है। अयोग्यता का निर्णय सदन का अध्यक्ष करता है।


103. [संविधान संशोधन एवं अनुच्छेद] - 61वें संविधान संशोधन अधिनियम (1989) द्वारा मतदान की न्यूनतम आयु सीमा को 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष किया गया था।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 326

   व्याख्या: राजीव गांधी सरकार के कार्यकाल में किए गए इस संशोधन ने अनुच्छेद 326 में संशोधन कर युवाओं को चुनावी प्रक्रिया में बड़ी भागीदारी दी। इसके कारण देश में मतदाताओं की संख्या में भारी वृद्धि हुई और निर्वाचन आयोग को तीन सदस्यीय बनाना पड़ा था।


104. [संविधान संशोधन एवं अनुच्छेद] - 86वें संविधान संशोधन अधिनियम (2002) ने देश की शिक्षा प्रणाली में क्रांतिकारी बदलाव किए।

   व्याख्या: इस संशोधन ने एक साथ तीन स्थानों पर बदलाव किए: 1. अनुच्छेद 21A के तहत प्राथमिक शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाया, 2. अनुच्छेद 45 की भाषा बदलकर प्रारंभिक बाल्यावस्था देखरेख का निर्देश दिया, और 3. अनुच्छेद 51A के तहत 11वां मौलिक कर्तव्य जोड़ा।


105. [संविधान संशोधन एवं अनुच्छेद] - 101वें संविधान संशोधन अधिनियम (2016) द्वारा पूरे देश में 'वस्तु एवं सेवा कर' (GST) लागू किया गया था।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 279A

   व्याख्या: GST भारत में अप्रत्यक्ष कर प्रणाली में किया गया अब तक का सबसे बड़ा सुधार है जिसने 'एक राष्ट्र, एक कर, एक बाजार' के सपने को साकार किया। इसके तहत केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा लगाए जाने वाले दर्जनों अप्रत्यक्ष करों को समाप्त कर दिया गया। इसकी सिफारिश हेतु अनुच्छेद 279A के तहत जीएसटी परिषद का गठन किया गया।


106. [संविधान संशोधन एवं अनुच्छेद] - 103वें संविधान संशोधन अधिनियम (2019) द्वारा आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) के लिए 10% आरक्षण लागू किया गया।

   व्याख्या: इसके तहत सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से पिछड़े नागरिकों को सरकारी नौकरियों और उच्च शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश हेतु 10% आरक्षण दिया गया। इस संशोधन द्वारा संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में नए खंड (15(6) और 16(6)) जोड़े गए थे।


107. [संविधान संशोधन एवं अनुच्छेद] - 105वें संविधान संशोधन अधिनियम (2021) द्वारा राज्यों को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (OBC) की सूची तैयार करने की शक्ति बहाल की गई।

   व्याख्या: इससे पूर्व 102वें संशोधन द्वारा राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC) को संवैधानिक दर्जा दिया गया था, जिससे राज्यों की अपनी ओबीसी सूची बनाने की शक्ति पर अस्पष्टता पैदा हो गई थी। 105वें संशोधन ने स्पष्ट किया कि प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश को अपनी स्वयं की ओबीसी सूची बनाने का संप्रभु अधिकार है।


108. [संविधान संशोधन एवं अनुच्छेद] - 106वें संविधान संशोधन अधिनियम (2023) जिसे 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' कहा गया, लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33% आरक्षण देता है।

   व्याख्या: यह भारतीय संसद के इतिहास का एक मील का पत्थर है। इसके तहत लोकसभा, दिल्ली विधानसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं में सीधे चुने जाने वाले महिला प्रतिनिधियों के लिए कुल सीटों का एक-तिहाई भाग आरक्षित किया जाएगा। यह आरक्षण परिसीमन के बाद लागू होगा और इसकी प्रारंभिक अवधि 15 वर्ष होगी।


109. [संविधान संशोधन एवं अनुच्छेद] - अनुच्छेद 356 राज्यों में संवैधानिक तंत्र विफल होने पर 'राष्ट्रपति शासन' (President's Rule) लगाने का प्रावधान करता है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 356

   व्याख्या: यदि किसी राज्य के राज्यपाल से रिपोर्ट मिलने पर या अन्यथा राष्ट्रपति आश्वस्त हो जाए कि राज्य की सरकार संविधान के प्रावधानों के अनुसार नहीं चलाई जा सकती, तो राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है। सर्वप्रथम इसे 1951 में पंजाब राज्य में लगाया गया था, और इसका सर्वाधिक दुरुपयोग भी देखा गया है।


110. [संविधान संशोधन एवं अनुच्छेद] - अनुच्छेद 360 भारत में 'वित्तीय आपातकाल' (Financial Emergency) लगाने का उपबंध करता है जो देश में कभी लागू नहीं हुआ।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 360

   व्याख्या: यदि राष्ट्रपति आश्वस्त हो कि भारत या उसके किसी हिस्से की वित्तीय स्थिरता या साख खतरे में है, तो वह वित्तीय आपातकाल की घोषणा कर सकता है। इसके दौरान राष्ट्रपति केंद्र और राज्यों के सभी सरकारी कर्मचारियों (सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायाधीशों सहित) के वेतन और भत्तों को कम करने का निर्देश दे सकते हैं।


111. [संविधान सभा एवं निर्माण] - संविधान सभा के संवैधानिक सलाहकार सर बेनेगल नरसिंह राव (बी.एन. राव) ने म्यांमार (बर्मा) के संविधान का प्रारूप तैयार करने में भी सहायता की थी।

   व्याख्या: बी.एन. राव एक अत्यंत प्रतिष्ठित भारतीय सिविल सेवक और अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के न्यायाधीश थे। वे संविधान सभा के सदस्य नहीं थे, लेकिन उनके असाधारण कानूनी ज्ञान के कारण उन्हें मानद सलाहकार नियुक्त किया गया था। उन्होंने दुनिया भर के संविधानों का तुलनात्मक अध्ययन करके भारतीय संविधान की मजबूत नींव रखी थी।


112. [प्रस्तावना एवं विशेषताएं] - भारतीय संविधान को 'उधार का थैला' (Bag of Borrowings) कहा जाता है, लेकिन यह केवल नकल नहीं बल्कि भारतीय आवश्यकताओं के अनुकूल रूपांतरण है।

   व्याख्या: आलोचक अक्सर इसे अन्य देशों के संविधान की नकल कहते हैं, परंतु डॉ. अंबेडकर ने स्पष्ट किया था कि किसी संविधान के बुनियादी विचारों पर किसी का पेटेंट अधिकार नहीं होता। भारतीय निर्माताओं ने विदेशी प्रावधानों को हुबहू स्वीकार करने के बजाय भारतीय समाज की विविधता और समस्याओं के अनुकूल संशोधित करके अपनाया था।


113. [नागरिकता एवं संघ राज्य क्षेत्र] - संसद किसी भी विदेशी क्षेत्र को भारत में मिलाने के लिए अनुच्छेद 2 के तहत कानून बना सकती है, जैसा कि सिक्किम के मामले में किया गया था।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 2

   व्याख्या: सिक्किम को पहले 35वें संशोधन (1974) द्वारा एक सह-राज्य (Associate State) का दर्जा दिया गया था, और बाद में 36वें संविधान संशोधन अधिनियम (1975) द्वारा उसे पूर्ण राज्य के रूप में भारतीय संघ में शामिल किया गया था। अनुच्छेद 2 संसद को नए राज्यों को संघ में प्रवेश देने या स्थापित करने की शक्ति प्रदान करता है।


114. [मौलिक अधिकार] - अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत प्रत्येक नागरिक को आजीविका कमाने की स्वतंत्रता है, लेकिन राज्य इस पर उचित योग्यताएं या एकाधिकार लागू कर सकता है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 19(1)(g)

   व्याख्या: इसके तहत कोई भी नागरिक किसी भी वैध व्यवसाय को अपना सकता है, परंतु राज्य जनहित में किसी पेशे के लिए आवश्यक तकनीकी योग्यताएं अनिवार्य कर सकता है। साथ ही, राज्य स्वयं किसी उद्योग या सेवा को पूर्ण या आंशिक रूप से अपने नियंत्रण में ले सकता है (राज्य का एकाधिकार) जिसे कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती।


115. [राज्य के नीति निदेशक तत्व] - अनुच्छेद 39(b) और 39(c) समाजवादी सिद्धांतों को दर्शाते हैं जो भौतिक संसाधनों के उचित वितरण और धन के संकेंद्रण को रोकने का निर्देश देते हैं।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 39(b), (c)

   व्याख्या: अनुच्छेद 39(b) के अनुसार राज्य अपनी नीति इस प्रकार संचालित करेगा कि समुदाय के भौतिक संसाधनों का स्वामित्व और नियंत्रण इस प्रकार बंटा हो जिससे सामूहिक हित सर्वोत्तम रूप से पूरा हो। अनुच्छेद 39(c) कहता है कि आर्थिक व्यवस्था इस प्रकार चले जिससे धन और उत्पादन के साधनों का सर्वसाधारण के लिए अहितकारी संकेंद्रण न हो।


116. [मौलिक कर्तव्य] - वर्मा समिति (1999) ने कुछ मौलिक कर्तव्यों की कानूनी रूप से प्रवर्तनीयता और उनके क्रियान्वयन के लिए उपलब्ध कानूनों की पहचान की थी।

   व्याख्या: जस्टिस जे.एस. वर्मा समिति ने स्पष्ट किया कि यद्यपि मौलिक कर्तव्य सीधे न्यायोचित नहीं हैं, लेकिन राष्ट्रगौरव अपमान निवारण अधिनियम (1971), वन्यजीव संरक्षण अधिनियम (1972) और वन संरक्षण अधिनियम (1980) जैसे कानून विभिन्न मौलिक कर्तव्यों को अप्रत्यक्ष रूप से कानूनी रूप से लागू करते हैं और उल्लंघन करने वालों को दंडित करते हैं।


117. [संघीय कार्यपालिका (राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति)] - राष्ट्रपति के पास जेबी वीटो (Pocket Veto) की अद्भुत शक्ति है, जिसका प्रयोग 1986 में राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने भारतीय डाकघर संशोधन विधेयक पर किया था।

   व्याख्या: जेबी वीटो के तहत राष्ट्रपति किसी विधेयक पर न तो अपनी सहमति देता है, न ही उसे खारिज करता है और न ही पुनर्विचार के लिए लौटाता है, बल्कि अनिश्चित काल के लिए अपने पास लंबित रख लेता है। चूंकि भारतीय संविधान में राष्ट्रपति द्वारा विधेयक पर निर्णय लेने की कोई समय सीमा तय नहीं है, इसलिए भारतीय राष्ट्रपति का पॉकेट अमेरिकी राष्ट्रपति (जो 10 दिन में निर्णय लेने को बाध्य है) से भी बड़ा माना जाता है।


118. [संसद (लोकसभा व राज्यसभा)] - संसद में कोरम या गणपूर्ति (Quorum) प्रत्येक सदन के कुल सदस्यों का न्यूनतम दसवां भाग (1/10) होना अनिवार्य है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 100(3)

   व्याख्या: यदि किसी बैठक में न्यूनतम कोरम (लोकसभा में कम से कम 55 सदस्य और राज्यसभा में कम से कम 25 सदस्य) उपस्थित न हो, तो पीठासीन अधिकारी (अध्यक्ष या सभापति) का यह कर्तव्य होता है कि वह सदन को स्थगित कर दे या बैठक को तब तक के लिए रोक दे जब तक कोरम पूरा न हो जाए।


119. [राज्य कार्यपालिका व विधानमंडल] - अनुच्छेद 163 के अनुसार राज्यपाल को विवेकाधीन शक्तियां (Discretionary Powers) प्राप्त हैं जो राष्ट्रपति की तुलना में अधिक व्यापक हैं।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 163

   व्याख्या: संविधान स्पष्ट करता है कि यदि कोई प्रश्न उठता है कि कोई मामला राज्यपाल के विवेकाधीन है या नहीं, तो राज्यपाल का निर्णय अंतिम होता है। राज्यपाल अपनी विवेकाधीन शक्तियों का प्रयोग विधानसभा में बहुमत न होने पर मुख्यमंत्री की नियुक्ति, सरकार की बर्खास्तगी, विधानसभा को भंग करने और अनुच्छेद 200 के तहत किसी विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रखने में करता है।


120. [न्यायपालिका (SC और HC)] - न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) का सिद्धांत परंपरागत न्याय की सीमा से बाहर जाकर जनहित को सुरक्षित रखने की न्यायपालिका की शक्ति है।

   व्याख्या: जब कार्यपालिका और विधायिका अपने संवैधानिक दायित्वों को पूरा करने में विफल रहते हैं, जिससे नागरिकों के अधिकारों का हनन होता है, तब न्यायपालिका सक्रिय भूमिका निभाते हुए नीतिगत निर्देश जारी करती है। हालांकि इसके अतिरेक को 'न्यायिक अतिक्रमण' (Judicial Overreach) भी कहा जाता है जो शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत के खिलाफ है।


121. [पंचायती राज व स्थानीय शासन] - पेसा अधिनियम, 1996 (PESA - Panchayats Extension to Scheduled Areas Act) पंचायतों के प्रावधानों को पांचवीं अनुसूची के आदिवासी क्षेत्रों में विस्तारित करता है।

   व्याख्या: दिलीप सिंह भूरिया समिति की सिफारिश पर पारित पेसा कानून का मुख्य उद्देश्य आदिवासी समुदायों को स्वशासन प्रदान करना और उनकी पारंपरिक संस्कृति व जल, जंगल, जमीन के अधिकारों की रक्षा करना है। इसके तहत ग्राम सभाओं को लघु खनिजों, गौण वन उपज और भूमि अधिग्रहण के मामलों में अत्यधिक शक्तिशाली और निर्णय लेने का सर्वाधिकार दिया गया है।


122. [संवैधानिक व गैर-संवैधानिक निकाय] - केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) देश का मुख्य भ्रष्टाचार विरोधी निकाय है, जिसका गठन संथानम समिति की सिफारिश पर 1964 में किया गया था।

   व्याख्या: शुरुआत में यह एक कार्यकारी प्रस्ताव द्वारा गठित किया गया था, परंतु वर्ष 2003 में संसद द्वारा कानून पारित करके इसे पूर्ण वैधानिक दर्जा प्रदान किया गया। यह प्रशासनिक भ्रष्टाचार को रोकने के लिए स्वतंत्र जांच एजेंसियों जैसे सीबीआई (CBI) के कामकाज की निगरानी करता है।


123. [संविधान संशोधन एवं अनुच्छेद] - 44वें संविधान संशोधन (1978) द्वारा आंतरिक अशांति (Internal Disturbance) शब्द के स्थान पर 'सशस्त्र विद्रोह' (Armed Rebellion) जोड़ा गया था।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 352

   व्याख्या: 1975 में इंदिरा गांधी सरकार ने 'आंतरिक अशांति' के आधार पर ही देश में राष्ट्रीय आपातकाल लागू किया था, जिसका व्यापक दुरुपयोग देखा गया था। जनता पार्टी सरकार ने इस दुरुपयोग को भविष्य में रोकने के लिए आपातकाल के प्रावधानों को कड़ा किया और व्यवस्था की कि केवल वास्तविक सशस्त्र विद्रोह की स्थिति में ही आंतरिक आपातकाल लगाया जा सकेगा।


124. [मौलिक अधिकार] - अनुच्छेद 33 संसद को सशस्त्र बलों, अर्धसैनिक बलों और पुलिस बलों के सदस्यों के मौलिक अधिकारों को सीमित करने की विशेष शक्ति देता है।

   संबद्ध अनुच्छेद: अनुच्छेद 33

   व्याख्या: इसका मुख्य उद्देश्य इन बलों में अनुशासन बनाए रखना और उनके कर्तव्यों का उचित निर्वहन सुनिश्चित करना है। संसद द्वारा इस अनुच्छेद के तहत बनाए गए कानूनों को किसी भी कोर्ट में मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती। इसी के तहत सेना कानून (Army Act) आदि लागू होते हैं।


125. [राज्य के नीति निदेशक तत्व] - प्रसिद्ध न्यायविद् एम.सी. छागला के अनुसार, 'यदि सभी नीति निदेशक तत्वों को पूरी तरह लागू कर दिया जाए, तो हमारा देश पृथ्वी पर स्वर्ग बन जाएगा।'

   व्याख्या: छागला जी ने स्पष्ट किया था कि निदेशक तत्व केवल नैतिक उपदेश नहीं हैं बल्कि भारत को एक सच्चा सामाजिक-आर्थिक लोकतंत्र बनाने के अचूक साधन हैं। डॉ. अंबेडकर ने भी कहा था कि जो सरकार इन तत्वों की अनदेखी करेगी, उसे आगामी चुनावों में जनता के समक्ष निश्चित रूप से जवाबदेह होना पड़ेगा।


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