भारत का भौगोलिक स्वरूप एवं भौतिक विभाजन (Physiography of India) || भारत का नदी अपवाह तंत्र (Drainage System of India)
भारत का भौगोलिक स्वरूप एवं भौतिक विभाजन (Physiography of India)
अक्षांशीय विस्तार, मानक समय रेखा, हिमालय पर्वतमाला की परतें एवं प्रायद्वीपीय पठार
1. भारत की भौगोलिक स्थिति एवं सीमाएं (Location & Borders)
भारत पूर्ण रूप से पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध (अक्षांशीय दृष्टिकोण से) और पूर्वी गोलार्ध (देशांतरीय दृष्टिकोण से) में स्थित है। भारत का मुख्य भूमि भाग 8°4' उत्तरी अक्षांश से 37°6' उत्तरी अक्षांश तक तथा 68°7' पूर्वी देशांतर से 97°25' पूर्वी देशांतर तक विस्तृत है। भारत का सुदूर दक्षिणी बिंदु अंडमान निकोबार द्वीप समूह में स्थित इन्दिरा पॉइंट (Indira Point) है, जो 6°45' उत्तरी अक्षांश पर स्थित है (इसे पूर्व में पिगमैलियन पॉइंट कहा जाता था)।
भारत का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल लगभग 32,87,263 वर्ग किमी है, जो संपूर्ण विश्व के थल भाग का 2.42% है। क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत विश्व का सातवां बड़ा देश है (हमसे बड़े देश क्रमशः रूस, कनाडा, चीन, संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया हैं), जबकि जनसंख्या की दृष्टि से यह वर्तमान में अग्रणी स्थान पर है।
भारत का उत्तर से दक्षिण तक कुल विस्तार 3,214 किमी है, जबकि पूर्व से पश्चिम तक कुल चौड़ाई 2,933 किमी है। भारत की स्थलीय सीमा की लंबाई लगभग 15,200 किमी है, और मुख्य भूमि की तटीय सीमा की लंबाई 6,100 किमी है। यदि द्वीपों (अंडमान निकोबार व लक्षद्वीप) की तटीय सीमा को भी शामिल कर लिया जाए, तो भारत की कुल तटीय सीमा 7,516.6 किमी हो जाती है।
⏰ भारत का मानक समय और कर्क रेखा (Standard Time & Tropic of Cancer):
1. भारतीय मानक समय रेखा (IST): भारत का मानक समय 82.5° पूर्वी देशांतर रेखा से निर्धारित होता है, जो उत्तर प्रदेश में प्रयागराज के निकट 'नैनी' (या मिर्जापुर) से होकर गुजरती है। यह समय ग्रीनविच मीन टाइम (GMT) से 5 घंटे 30 मिनट आगे (+5:30) है। यह रेखा भारत के 5 राज्यों (उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा और आंध्र प्रदेश) से गुजरती है।
2. कर्क रेखा (23.5° N): भारत के बिल्कुल मध्य से होकर गुजरती है और इसे दो बराबर भागों में बांटती है। कर्क रेखा भारत के कुल 8 राज्यों से होकर गुजरती है।
🔥 कर्क रेखा के 8 राज्यों को याद रखने की अचूक ट्रिक:
"मित्र पर गमछा झार"
- मि: मिजोरम
- त्र: त्रिपुरा
- प: पश्चिम बंगाल
- र: राजस्थान
- ग: गुजरात
- म: मध्य प्रदेश
- छा: छत्तीसगढ़
- झार: झारखंड
2. हिमालय पर्वत श्रृंखला का वैज्ञानिक वर्गीकरण (The Himalayas)
हिमालय एक नवीन वलित पर्वत (Young Fold Mountain) का उदाहरण है, जिसकी उत्पत्ति पूर्व में स्थित टेथिस सागर (Tethys Sea) के अवसादों में यूरेशियन प्लेट और इंडो-ऑस्ट्रेलियन प्लेट के आपसी टकराव और संपीड़न बल के कारण हुई है। भौगोलिक दृष्टि से हिमालय को उत्तर से दक्षिण के क्रम में चार प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया गया है:
- ट्रांस हिमालय (Trans Himalayas): यह हिमालय का सबसे प्राचीन और उत्तरतम भाग है, जो मुख्य हिमालय के बनने से पूर्व बन चुका था। इसमें काराकोरम, लद्दाख, जास्कर और कैलाश श्रेणियां शामिल हैं। भारत की सबसे ऊंची पर्वत चोटी के-2 (गॉडविन ऑस्टिन - 8,611 मीटर) इसी काराकोरम श्रेणी का हिस्सा है, जो वर्तमान में पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) में है।
- वृहद या महान हिमालय (Greater Himalayas / Himadri): यह हिमालय की सबसे ऊंची, अखंड और केंद्रीय श्रृंखला है। इसकी औसत ऊंचाई लगभग 6100 मीटर है। विश्व की सबसे ऊंची पर्वत चोटियाँ इसी श्रेणी में स्थित हैं, जैसे माउंट एवरेस्ट (8,848.86 मीटर, नेपाल में 'सागरमाथा'), कंचनजंगा (8,586 मीटर, सिक्किम, भारत), नंगा पर्वत और नंदा देवी।
- लघु या मध्य हिमालय (Lesser Himalayas / Himachal): यह महान हिमालय के दक्षिण में स्थित है, जिसकी औसत ऊंचाई 3700 से 4500 मीटर है। भारत के प्रसिद्ध हिल स्टेशन (शिमला, मनाली, डलहौजी, मसूरी, नैनीताल, दार्जिलिंग) इसी श्रेणी के ढलानों पर स्थित हैं। यहाँ के छोटे-छोटे घास के मैदानों को कश्मीर में 'मर्ग' (जैसे सोनमर्ग, गुलमर्ग) और उत्तराखंड में 'बुग्याल' या 'पयाल' कहा जाता है।
- शिवालिक या बाह्य हिमालय (Outer Himalayas / Shiwalik): यह हिमालय की सबसे दक्षिणी और सबसे नवीन श्रृंखला है, जिसकी ऊंचाई काफी कम (900 से 1200 मीटर) है। शिवालिक और लघु हिमालय के बीच पाई जाने वाली समतल घाटियों को पश्चिम में 'दून' (जैसे देहरादून) और पूर्व में 'द्वार' (जैसे हरिद्वार) कहा जाता है।
भारत का नदी अपवाह तंत्र (Drainage System of India)
हिमालयी नदियों की यात्रा, प्रायद्वीपीय नदियों का प्रवाह, डेल्टा एवं एस्चुरी का निर्माण
1. हिमालयी नदी तंत्र (Himalayan River System)
हिमालयी नदियां बारहमासी (सदावाहिनी) होती हैं क्योंकि इन्हें वर्षा ऋतु में वर्षा के जल के अतिरिक्त शीतकाल और ग्रीष्मकाल में ग्लेशियरों (हिमनद) के पिघलने से निरंतर जल प्राप्त होता रहता है। इसे तीन प्रमुख अपवाह प्रणालियों में वर्गीकृत किया जाता है:
- गंगा नदी तंत्र (Ganga River System): गंगा भारत की सबसे लंबी और सबसे पवित्र नदी है, जिसकी कुल लंबाई 2,525 किमी है। इसकी उत्पत्ति उत्तराखंड में उत्तरकाशी जिले के गंगोत्री ग्लेशियर से 'भागीरथी' के रूप में होती है। देवप्रयाग में जब अलकनंदा नदी भागीरथी से मिलती है, तब इसका संयुक्त नाम 'गंगा' पड़ता है। हरिद्वार में गंगा मैदानी भाग में प्रवेश करती है। बांग्लादेश में गंगा को 'पद्मा' के नाम से जाना जाता है। गंगा की सबसे बड़ी सहायक नदी यमुना है, जो यमुनोत्री ग्लेशियर से निकलती है और प्रयागराज में गंगा से मिलती है। अन्य सहायक नदियों में रामगंगा, घाघरा, गंडक, कोसी (बिहार का शोक) और सोन प्रमुख हैं।
- सिंधु नदी तंत्र (Indus River System): सिंधु नदी तिब्बत में मानसरोवर झील के पास स्थित 'सानोख्याब' हिमनद से निकलती है। इसकी कुल लंबाई 2,880 किमी है, परंतु भारत में इसका प्रवाह केवल 1,114 किमी है। वर्ष 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए 'सिंधु जल समझौते' के तहत भारत इसके केवल 20% जल का उपयोग कर सकता है। इसकी प्रमुख सहायक नदियां झेलम, चिनाब (सिंधु की सबसे बड़ी सहायक नदी), रावी, ब्यास और सतलुज हैं।
- ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र (Brahmaputra River System): ब्रह्मपुत्र तिब्बत में मानसरोवर झील के पास 'चेमायुंगडुंग' ग्लेशियर से निकलती है। तिब्बत में इसे 'सांगपो' (Tsangpo) यानी पवित्र करने वाली कहा जाता है। यह अरुणाचल प्रदेश के नामचा बरवा पर्वत से यू-टर्न लेकर भारत में प्रवेश करती है, जहाँ इसे 'दिहांग' कहा जाता है। असम में इसे 'ब्रह्मपुत्र' और बांग्लादेश में इसे 'जमुना' कहा जाता है। जब पद्मा (गंगा) और जमुना (ब्रह्मपुत्र) आपस में मिलती हैं, तो इनकी संयुक्त धारा को 'मेघना' कहते हैं। ये दोनों नदियां मिलकर विश्व के सबसे बड़े डेल्टा 'सुंदरवन डेल्टा' का निर्माण करती हैं।
2. प्रायद्वीपीय नदी तंत्र (Peninsular River System)
प्रायद्वीपीय नदियां अत्यंत प्राचीन हैं और ये मौसमी होती हैं, क्योंकि इनका जल स्रोत मुख्यतः वर्षा पर निर्भर करता है। इन्हें उनके ढलान के आधार पर दो भागों में विभाजित किया गया है:
🌊 पूर्व की ओर बहने वाली नदियां (बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली)
ये नदियां पश्चिमी घाट से निकलकर पूर्व की ओर बहती हैं और बंगाल की खाड़ी में गिरने से पूर्व विशाल उपजाऊ 'डेल्टा' का निर्माण करती हैं।
- गोदावरी (1465 किमी): इसे 'दक्षिण गंगा' या 'वृद्ध गंगा' कहते हैं। यह प्रायद्वीपीय भारत की सबसे लंबी नदी है जो त्र्यंबकेश्वर (नासिक) से निकलती है।
- कृष्णा (1400 किमी): महाबलेश्वर से निकलती है। इसकी प्रसिद्ध सहायक नदी तुंगभद्रा और भीमा हैं।
- कावेरी (800 किमी): ब्रह्मगिरि पहाड़ियों (कर्नाटक) से निकलती है। इसे 'दक्षिण भारत की गंगा' कहा जाता है क्योंकि इसमें वर्षभर पानी रहता है।
- महानदी (851 किमी): छत्तीसगढ़ के सिहावा पहाड़ी से निकलती है। इस पर भारत का सबसे लंबा बांध 'हीराकुंड' स्थित है।
🌋 पश्चिम की ओर बहने वाली नदियां (अरब सागर में गिरने वाली)
ये नदियां कठोर पठारी भागों से बहती हैं, इसलिए अपने साथ सिल्ट (अवसाद) नहीं ला पातीं। ये अरब सागर में गिरते समय डेल्टा के बजाय ज्वारनदमुख (Estuary) का निर्माण करती हैं।
- नर्मदा (1312 किमी): मध्य प्रदेश के अमरकंटक पहाड़ी से निकलती है। यह विंध्याचल और सतपुड़ा पर्वत श्रेणियों के बीच भ्रंश घाटी (Rift Valley) में बहती है। इस पर प्रसिद्ध 'धुआंधार जलप्रपात' स्थित है।
- ताप्ती (724 किमी): मध्य प्रदेश के बैतूल जिले के मुल्ताई से निकलती है। यह भी भ्रंश घाटी में बहती है।
- लूनी: यह राजस्थान के अरावली से निकलती है और कच्छ के रन में विलीन हो जाती है। इसे 'अंतःस्थलीय अपवाह नदी' कहते हैं।
- साबरमती व माही: माही भारत की एकमात्र नदी है जो कर्क रेखा को दो बार काटती है।
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